अधिवक्ता दिवस : जानिए नेहरू ने भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद के साथ कैसा व्यवहार किया था

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  • भारत के प्रथम राष्ट्रपति एवम प्रतिष्ठित वकील डॉ. राजेंद्र प्रसाद की जयंती के उपलक्ष्य में 3 दिसंबर को भारत में अधिवक्ता दिवस मनाया जाता है

अरबपति कारोबारी और पूर्व राज्यसभा सांसद रवींद्र किशोर (RK) सिन्हा ने अपनी पुस्तक ‘बेलाग लपेट‘ में विस्तृत रूप से जिक्र करते हुए बताया है कि कैसे 12 वर्षों तक राष्ट्रपति रहने के बाद जब राजेंद्र प्रसाद पटना जाकर रहने लगे, तब नेहरू ने उनके लिए एक सरकारी आवास तक की व्यवस्था नहीं की थी। वो सदाकत आश्रम स्थित बिहार विद्यापीठ में एक सीलन वाले कमरे में रहते थे। दमा के रोगी थे, लेकिन उनके स्वास्थ्य का कोई ख्याल नहीं रखा गया।

इस दौरान भारतीय संविधान सभा के प्रथम अध्यक्ष और भारत के पहले राष्ट्रपति से मिलने पहुँचे जयप्रकाश नारायण से उनकी हालत देखी नहीं गई। 28 फरवरी, 1963 को जिस कमरे में डॉ राजेंद्र प्रसाद का निधन हुआ, उसे किसी तरह अपने सहयोगियों के साथ मिल कर जयप्रकाश नारायण ने ही रहने लायक बनाया था। उनके अंतिम संस्कार में भाग लेने भी नेहरू नहीं पहुँचे। वो इस दौरान जयपुर में ‘तुलादान’ नामक एक साधारण से कार्यक्रम में शिरकत कर रहे थे।

उस समय संपूर्णानंद राजस्थान के राज्यपाल थे और उनकी बड़ी इच्छा थी कि वो डॉ प्रसाद की अंत्येष्टि में भाग लेने पटना जाएँ, लेकिन उन्हें नेहरू ने ये कहते हुए रोक दिया कि प्रधानमंत्री के दौरे में राज्यपाल ही नदारद रहेगा तो ये ठीक नहीं होगा। संपूर्णानंद ने खुद इसका खुलासा किया है। दिल्ली में बैठे बिहार के बड़े नेताओं ने राजेंद्र बाबू के अंतिम दर्शन नहीं किए, इसका संपूर्णानंद को मलाल था। डॉ राधाकृष्णन को भी नेहरू ने पटना न जाने की सलाह दी थी, लेकिन वो गए।

आरके सिन्हा लिखते हैं कि पटना में राजेंद्र बाबू के साथ बेरुखी वाला व्यवहार होना और उन्हें मामूली स्वास्थ्य सुविधाएँ तक न मिलना, ये सब नेहरू के इशारे पर हुआ था। कफ निकालने वाली एक मशीन उनके कमरे में थी, जिसे राज्य सरकार ने पटना मेडिकल कॉलेज में भिजवा दिया। वो खाँसते-खाँसते चल बसे। ये भी जानने लायक बात है कि सोमनाथ मंदिर को लेकर भी जवाहरलाल नेहरू और डॉ राजेंद्र प्रसाद में तनातनी हुई थी।

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