निकाय चुनाव टलना तय, ओबीसी आरक्षण पर फैसला सुरक्षित, 27 दिसंबर को सुनाया जाएगा

up nagar nikay chunav 2022
0 0

UP Nagar Nikay Chunav 2022 : लखनऊ। यूपी नगर निकाय चुनाव में OBC आरक्षण को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने शनिवार को सुनवाई के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया। यूपी निकाय चुनाव को लेकर हाईकोर्ट की स्पेशल बेंच 27 दिसंबर को अपना फैसला सुनाएगी। इससे निकाय चुनाव टलना तय मान लिया गया है। हाईकोर्ट ने आज की सुनवाई में सीधे तौर पर ट्रिपल टेस्ट न कराने और 2017 के रैपिड टेस्ट को ही आधार मानकर इस बार भी आरक्षण देने पर सवाल उठाया। 

हाईकोर्ट में सुबह 11.15 बजे सुनवाई शुरू हुई और शाम 3.45 बजे फैसला आया। याचिकाकर्ता के वकील ने सबसे पहले अपना पक्ष रखा। उन्होंने कहा कि हमारी मांग है कि अन्य पिछड़ा वर्ग आरक्षण के लिए एक डेडिकेटेड कमीशन बनाया जाए, जो राजनीतिक पिछड़ेपन की रिपोर्ट दे. उसी पर अन्य पिछड़ा वर्ग का आरक्षण तय किया जाए. एडवोकेट पी एल मिश्रा बहस कर रहे थे. उन्होंने सुरेश महाजन बनाम मध्य प्रदेश सरकार 2021 केस में सुप्रीम कोर्ट का आदेश विस्तार से पढ़ा।

शुक्रवार को समय की कमी के कारण सुनवाई पूरी नहीं हो सकी थी। न्यायमूर्ति देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति सौरभ लवानिया की खंडपीठ में बीते बुधवार को सुनवाई के दौरान याचियों की ओर से दलील दी गई थी कि निकाय चुनावों में ओबीसी आरक्षण एक प्रकार का राजनीतिक आरक्षण है। 

फैसला आने तक किसी तरह की अधिसूचना भी जारी नहीं की जा सकेगी। इस तरह निकाय चुनाव को लेकर शुरू हुई न्यायिक प्रक्रिया ने सभी राजनैतिक सहित चुनाव लड़ने वालो के दिल की धड़कनो को तेज कर दिया है। राजनैतिक समीक्षको का मानना है कि अगर याचिका कर्ताओ के पक्ष में फैसला आया तो इसका खासा असर लोकसभा के चुनाव पर देखने को मिल सकता है।

याचिकाकर्ताओं ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने सुरेश महाजन केस में निर्णय में स्पष्ट आदेश दिया था कि नगर निकाय चुनावों में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) आरक्षण से पहले ट्रिपल टेस्ट कराया जाएगा। अगर तिहरा परीक्षण की शर्त पूरी नहीं की जाती है तो अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) के अलावा बाकी सभी सीटों को सामान्य सीट घोषित करते हुए चुनाव कराया जाना चाहिए।  

महिला आरक्षण को आरक्षण श्रेणी में रखने की बात आई। जबकि याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि महिला आरक्षण को 50% आरक्षण से बाहर रखा है। सरकारी वकील ने महिला आरक्षण को हॉरिजेंटल आरक्षण (क्षैतिज आरक्षण) बताया. सरकारी वकील ने माना कि राजनीतिक आरक्षण के लिए कोई आयोग नहीं बनाया गया है. ऐसे में कोर्ट ने पॉलिटिकल बैकवर्ड रिजर्वेशन और सोशल बैकवर्ड रिज़र्वेशन को अलग अलग माना।

advertisement at ghamasaana