बागपत। आमतौर पर दशहरे पर रावण के पुतले का दहन बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक के रूप में किया जाता है, लेकिन उत्तर प्रदेश के बागपत जिले में एक ऐसा गांव भी है, जहां रावण के प्रति लोगों की गहरी आस्था है। बड़ागांव उर्फ रावण में सदियों से लंकेश की पूजा किए जाने की परंपरा चली आ रही है। यहां न तो रामलीला का आयोजन होता है और न ही दशहरे पर रावण का पुतला जलाया जाता है। ग्रामीण रावण को अपना पूर्वज और गांव का संस्थापक मानते हैं।

दिल्ली-यमुनोत्री हाईवे-709बी पर पाठशाला चौराहे से करीब 11 किलोमीटर दूर स्थित यह गांव धार्मिक और पुरातात्विक महत्व के लिए भी जाना जाता है। यहां प्राचीन मंदिर, मूर्तियां और ऐतिहासिक अवशेष मौजूद हैं। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, रावण का इस गांव से विशेष संबंध रहा है।

मंशादेवी मंदिर के पुजारी रमाशंकर तिवारी के मुताबिक, रावण हिमालय से मां मंशादेवी की मूर्ति लेकर जा रहा था। रास्ते में बड़ागांव के पास उसे लघुशंका के लिए रुकना पड़ा। उसने देवी की मूर्ति जमीन पर रख दी। मान्यता थी कि मूर्ति को पहली बार जहां रखा जाएगा, वहीं उसकी स्थापना हो जाएगी। इसी कारण मूर्ति उसी स्थान पर स्थापित हो गई।

कहा जाता है कि इसके बाद रावण ने यहां एक कुंड खोदा और उसमें स्नान कर तपस्या की। इस कुंड को आज रावण कुंड के नाम से जाना जाता है। स्थानीय किंवदंती के अनुसार, इसी घटना के चलते गांव का नाम रावण पड़ा। राजस्व अभिलेखों में भी गांव का नाम रावण उर्फ बड़ागांव दर्ज होने की बात कही जाती है।

गांव की पहचान केवल रावण की पूजा तक सीमित नहीं है। यहां स्थित सिद्धपीठ मंदिर में भगवान विष्णु की दशावतार मूर्ति है, जिसे पुरातत्वविद सातवीं शताब्दी का बताते हैं। मंदिर में प्राचीन स्तंभ और अन्य मूर्तियां भी मौजूद हैं। इसके अलावा, गांव में कई जैन मंदिर हैं। यहां स्थित त्रिलोकतीर्थ मंदिर में दर्शन के लिए देश-विदेश से जैन धर्मावलंबी पहुंचते हैं।

ग्रामीणों का कहना है कि वे रावण के विद्वान और मर्यादित पक्ष को महत्व देते हैं। उनकी मान्यता है कि रावण ने माता सीता के प्रति भी मर्यादा का पालन किया था। इसी विश्वास के चलते गांव के लोग उसके जीवन से जुड़ी अच्छाइयों को अपनाने की कोशिश करते हैं। यही वजह है कि बड़ागांव में दशहरे पर रावण का पुतला जलाने के बजाय उसकी पूजा की जाती है और रामलीला का आयोजन भी नहीं होता।