नई दिल्ली। भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षित सीटों को बारी-बारी से बदलने (रोटेशन) की मांग करने वाली एक याचिका पर सुनवाई के दौरान सख्त टिप्पणी की है। याचिकाकर्ता को जवाब देते हुए सीजेआई ने कहा कि आप गलत नंबर डायल कर रहे हैं। उन्होंने सुझाव दिया कि यह विरोध-प्रदर्शन और अपनी आवाज उठाने का सही समय है, लेकिन यह मुद्दा न्यायपालिका के बजाय कानून बनाने वालों यानी सांसदों और विधायकों के सामने उठाया जाना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने स्पष्ट किया कि निर्वाचन क्षेत्रों के आरक्षण और उनके रोटेशन का मामला पूरी तरह से विधायिका और संवैधानिक प्राधिकरणों के अधिकार क्षेत्र में आता है। अनुच्छेद 32 के तहत दायर याचिका के माध्यम से अदालत इस व्यवस्था में हस्तक्षेप नहीं कर सकती। जस्टिस जॉयमाल्य बागची और सीजेआई की बेंच ने उस अपील को खारिज कर दिया जिसमें दशकों से बिना रोटेशन के जारी आरक्षण को चुनौती दी गई थी।

याचिकाकर्ता का तर्क था कि 1972 से कई सीटें आरक्षित हैं, जिससे एक ही परिवार के लोग बार-बार चुनाव लड़ रहे हैं और मतदाताओं के विकल्प सीमित हो गए हैं। इस पर अदालत ने कहा कि मतदाताओं का वोट देने का अधिकार सुरक्षित है, भले ही विकल्प कम हों। जस्टिस बागची ने कहा कि अदालत किसी प्रावधान की व्याख्या तो कर सकती है, लेकिन वह संवैधानिक प्रावधानों को फिर से नहीं लिख सकती। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि न्यायपालिका संसद के तीसरे सदन की भूमिका नहीं निभा सकती।

अंत में, अदालत ने याचिकाकर्ता को सलाह दी कि वे इस मुद्दे को राजनीतिक और चुनावी मांग बनाएं। सीजेआई ने कहा कि मतदाता अपने प्रतिनिधियों से कह सकते हैं कि जब तक परिसीमन और आरक्षण ढांचे में बदलाव नहीं होता, तब तक वे समर्थन नहीं करेंगे। अदालत ने दोहराया कि संवैधानिक सीमाओं