देहरादून l प्रधानाचार्य सीमित विभागीय परीक्षा का मामला गर्माने लगा है। जहां राजकीय शिक्षक संघ का एक गुट इस परीक्षा का विरोध कर रहा है, वहीं अब प्रधानाचार्य पद को परीक्षा आधार पर भरने के समर्थक शिक्षक खुलकर मैदान में आ गए हैं। उन्होंने रविवार को बैठक कर परीक्षा स्थगित करने का विरोध जताया और सरकार के इस फैसले को दुर्भाग्यपूर्ण करार दिया।

बता दें कि राजकीय शिक्षक संघ इस परीक्षा का विरोध कर रहा है और संगठन के पदाधिकारी शिक्षक एक पखवाड़े से शिक्षण का काम छोड़कर आंदोलन में जुटे हुए हैं। उनके दबाव में सरकार परीक्षा स्थगित कर चुकी है लेकिन इसके बावजूद शिक्षक परीक्षा निरस्त करने की मांग को लेकर भूख हड़ताल पर बैठे हैं। इस परीक्षा के लिए करीब 2900 शिक्षकों ने लोक सेवा आयोग में आवेदन किया था और दबी जुबान में वे अभी तक राजकीय शिक्षक संघ के फैसले पर नाखुशी भी जाहिर कर रहे थे।

रविवार को परीक्षा समर्थक शिक्षकों ने राजधानी में प्रिंस चौक के निकट एक होटल में बैठक कर मोर्चा खोल दिया। शिक्षकों का कहना था कि यह सीमित विभागीय परीक्षा है और इसके जरिये प्रधानाचार्यों के 50 प्रतिशत पद ही भरे जाने थे, लेकिन कुछ लोगों ने इसे सीधी भर्ती परीक्षा बताकर दुष्प्रचार किया है।

वक्ताओं का कहना था कि परीक्षा होनी चाहिए क्योंकि इससे काबिल लोग प्रधानाचार्य पद पर पहुंचेंगे और यही छात्रहित में सही होगा। शिक्षकों ने कहा कि नई शिक्षा नीति के अनुरूप भी परीक्षा कराना सही है। बैठक करने वाले शिक्षक भी राजकीय शिक्षक संघ के सदस्य हैं और उनका कहना है कि ये फैसला लेने से पहले सरकार ने संघ से सहमति ली थी। इस बाबत बुलाई गयी बैठक के मिनट्स में यह सब दर्ज है लेकिन बाद में कुछ लोगों ने निहित स्वार्थों के चलते इस पर हंगामा खड़ा कर दिया।

बैठक में प्रदेश के सभी जनपदों से आए शिक्षक शामिल हुए। इनमें मोनिका गौड, रश्मि नेगी, विनीता बहुगुणा, ललिता, श्वेता नदी, अरविन्द चौहान, शान्ति प्रसाद रतूडी, हर्षमणि चमोली, द्वारिका प्रसाद पुरोहित, डाॅ. कमलेश मिश्रा, डीएस भण्डारी, रवि चंद सिंह, आशीष चन्द्र रमोला, बृजेश पंवार, नरेन्द्र सिंह, राकेश उनियाल, नेत्रमणि बडोनी, बचन जितेला, डाॅ. लक्ष्मण सिंह चौहान, नवीन चौहान, सीएल शाह, महावीर चरण, मनोज घुनियाल, राजेश रमोला, मुकेश आदि शामिल थे।

विगत कई वर्षों से प्रधानाचार्य/प्रधानाध्यापक के पद पर उच्च न्यायालय में योजित अलग-अलग याचिकाओं के कारण पदोन्नति से नही भरे जा सके हैं। बैठक में शिक्षकों ने कहा कि अलग-अलग स्रोतों से नियुक्त शिक्षकों के स्वहित के कारण आने वाले समय में इसका समाधान होगा, ऐसा प्रतीत नहीं होता है। लम्बी अवधि तक प्रधानाचार्य/प्रधानाध्यापक के पद रिक्त रहने से स्कूलों की व्यवस्थाएं बिगड़ रही हैं। शिक्षकों का कहना था कि जिन कारणों से अभी तक पदोन्नति टलती रही वे खत्म नहीं हो गए हैं और आगे हालात कैसे बदल जाएंगे कोई नहीं जानता।

उधर, शिक्षा निदेशालय पर राजकीय शिक्षक संघ की भूख हड़ताल रविवार को दूसरे दिन भी जारी रही। जो तीन शिक्षक शनिवार को भूख हड़ताल पर बैठे थे वे रविवार को भी हड़ताल पर रहे। शाम के समय मुख्यमंत्री के प्रतिनिधि के तौर पर दलवीर दानू ने धरनास्थल पर जाकर शिक्षक नेताओं से बातचीत की और आंदोलन वापस लेने का अनुरोध किया। उनका कहना था कि सरकार आगे कोई निर्णय लेने से पहले शिक्षकों की भावनाओं का ध्यान रखेगी। हालांकि, शिक्षकों ने इस पर तुरंत कोई फैसला करने से इंकार कर दिया। उनका कहना था कि इस बारे में सोमवार को दोनों मंडलों के पदाधिकारियों की बैठक बुलाकर फैसला किया जाएगा।

प्रदेश के सैकड़ों शिक्षकों द्वारा परीक्षा का समर्थन करने के सवाल पर राजकीय शिक्षक संघ के प्रदेश अध्यक्ष राम सिंह चौहान ने नाराजगी जताई। उनका कहना था कि शिक्षक परीक्षा क्यों कराना चाहते हैं जबकि संगठन ने लंबे संघर्ष के बाद इसे पदोन्नति का पद कराया है। चौहान ने सवाल किया कि परीक्षा समर्थक शिक्षक अगर इतने ज्यादा काबिल हैं तो वे पीसीएस या लोवर पीसीएस जैसी परीक्षा क्यों नहीं देते। उन्हें दूसरे विभागों में अधिकारी बनने से किसने रोका है