नई दिल्ली/इस्लामाबाद : सिंधु नदी के जल पर रोक से बौखलाए पाकिस्तान ने भी अपनी तरफ से जवाबी कार्रवाई की। इसमें शिमला समझौता भी शामिल है, जिसे पाकिस्तान ने सस्पेंड कर दिया। अब कह सकते हो कि पाकिस्तान पागल हो गया है। क्योंकि शिमला समझौता सस्पेंड कर उसने अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली है। आइए जानते हैं कि पूरा मामला क्या है।
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ ने नेशनल सिक्योरिटी कमेटी (NSC) की आपात बैठक बुलाई। इस बैठक में पाकिस्तान ने भारत पर अंतरराष्ट्रीय कानून और संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों का उल्लंघन करने का आरोप लगाया और शिमला समझौते को सस्पेंड करने की घोषणा की। पाकिस्तान ने यह भी कहा कि वह भारत के साथ किए गए सभी द्विपक्षीय समझौतों को निलंबित करने का अधिकार सुरक्षित रखता है।
शिमला समझौता फिर चर्चा में: क्या है इसका इतिहास और महत्व?
शिमला समझौता 2 जुलाई 1972 को भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और पाकिस्तान के राष्ट्रपति ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो के बीच शांति बहाली के उद्देश्य से साइन हुआ था। यह 1971 के भारत-पाक युद्ध के बाद अस्तित्व में आया था, जिसने बांग्लादेश को स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में जन्म दिया।
समझौते की प्रमुख बातें:
- द्विपक्षीय वार्ता पर सहमति – दोनों देश अपने विवादों को आपसी बातचीत से सुलझाएंगे, किसी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता स्वीकार नहीं की जाएगी।
- बल प्रयोग पर रोक – भारत और पाकिस्तान ने हिंसा या सैन्य बल के प्रयोग से बचने का संकल्प लिया।
- नियंत्रण रेखा (LoC) की पुनर्स्थापना – युद्ध के बाद दोनों देशों ने एक नई नियंत्रण रेखा को मान्यता दी, जो आज तक लागू है।
- युद्धबंदियों और जमीन की वापसी – भारत ने 93,000 पाकिस्तानी सैनिकों को बिना किसी शर्त रिहा किया और अधिकांश कब्जाई गई जमीन भी वापस लौटाई।
क्या पाकिस्तान शिमला समझौते को रद्द कर सकता है?
शिमला समझौता एक द्विपक्षीय राजनीतिक समझौता medicamento है, जो अंतरराष्ट्रीय संधि की तरह बाध्यकारी नहीं है, लेकिन इसका राजनीतिक और कूटनीतिक महत्व बेहद बड़ा है। यदि पाकिस्तान इसे एकतरफा सस्पेंड करता है, तो इससे दोनों देशों के बीच बातचीत और शांति प्रक्रिया पर गंभीर असर पड़ सकता है। यह क्षेत्रीय स्थिरता को भी प्रभावित कर सकता है।

