भारत और पाकिस्तान का युद्ध लंबा खिंचता तो हमारा कितना नुकसान होता, जानिए

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भारत ने हाल ही में पाकिस्तान के प्रति अपनी सैन्य और रणनीतिक क्षमता का स्पष्ट प्रदर्शन किया है। आतंकी हमलों को लेकर भारत का रुख सख्त रहा है और उसने यह संदेश दिया है कि वह आतंकवाद को समर्थन देने वाले किसी भी देश को बख्शेगा नहीं, चाहे वह परमाणु हथियारों से लैस ही क्यों न हो। भारत के पास अब ऐसे उन्नत ड्रोन और लंबी दूरी की मिसाइलें हैं जिनसे वह पाकिस्तान के भीतर गहराई तक निशाना साध सकता है, बिना सीमा पार किए। नौसेना भी पाकिस्तान के तटीय इलाकों में रणनीतिक ठिकानों पर कार्रवाई करने में सक्षम है।

हालांकि, यह सैन्य प्रदर्शन महज़ शक्ति प्रदर्शन नहीं था, बल्कि एक सख्त संदेश था। इसके बाद अब वक्त है तनाव कम करने का। लम्बे समय तक चलने वाला युद्ध न भारत के हित में होता, न पाकिस्तान के। ऐसे टकराव में जान-माल की हानि तो होती ही है, साथ ही दोनों देशों की अर्थव्यवस्था और सामाजिक ढांचे पर भी गहरा असर पड़ता है।

वाशिंगटन डीसी समेत अंतरराष्ट्रीय समुदाय भारत और पाकिस्तान को ऐसे राष्ट्रों के रूप में देखता है जो अतीत में भी 2016 और 2019 में टकराव के बावजूद युद्ध की गंभीर स्थिति से बचते आए हैं। हालांकि, कुछ समय तक यह आशा बहुत सकारात्मक लग रही थी, लेकिन अंततः दोनों पक्षों ने युद्धविराम की दिशा में कदम बढ़ाए। हालांकि भारतीय पक्ष ने अमेरिका द्वारा मध्यस्थता किए जाने के दावे को खारिज कर दिया।

मीडिया और जनभावनाओं की बात करें तो दोनों देशों में देशभक्ति की लहर मीडिया में स्पष्ट दिखी। नेताओं को उकसाने वाली खबरें और ‘जीत तक लड़ाई’ की हुंकार आम थी। लेकिन अब हालात को स्थिरता की ओर मोड़ने की ज़रूरत है। कश्मीर मुद्दे को लेकर एक बात साफ होती जा रही है — इसका हल सैन्य नहीं, राजनीतिक है। सेना वर्षों से तैनात है, लेकिन कट्टरपंथ और अलगाव की सोच से लड़ने के लिए राजनीतिक संवाद और सामाजिक समावेश की ज़रूरत है।

जहां तक भारत और पाकिस्तान की सैन्य क्षमताओं की तुलना की बात है, भारत कई मामलों में पाकिस्तान से आगे है — चाहे वह सैनिकों की संख्या हो, एयरफोर्स की ताकत, नौसेना की क्षमता या अत्याधुनिक हथियार। लेकिन किसी भी युद्ध में केवल संख्याएं ही निर्णायक नहीं होतीं। भारत को चीन के मोर्चे पर भी सतर्क रहना पड़ता है, जो पाकिस्तान का रणनीतिक साझेदार है। भारत की सबसे बड़ी चिंता यही रहती है कि यदि संघर्ष बढ़ा, तो चीन भी मोर्चा खोल सकता है।

इन्हीं कारणों से, युद्धविराम की दिशा में उठाया गया कदम एक समझदारी भरा निर्णय है — ऐसा फैसला जो न केवल वर्तमान संकट से उबारता है, बल्कि भविष्य के लिए भी स्थिरता की राह खोलता है।

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