- जयंती 9 जनवरी पर विशेष
गुरुओं की परम्परा में दशमेश गुरु गोविंद जी सदैव अनन्य हैं और रहेंगे। हिन्दुत्व और भारतीय धर्म की अस्मिता के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर करने वालों में गुरु गोविंद सिंह जी जैसा अन्य कोई नहीं । उनका त्याग और बलिदान सदियों तक याद किया जाता रहेगा।धर्म के सच्चे बादशाह गुरु गोविंद सिंह जी महाराज ने हिंदू धर्म की रक्षा के लिए जो किया , उसकी मिसाल उनसे पूर्व और पश्चात कहीं दृष्टिगोचर नहीं होती।खालसा पंथ के संस्थापक गुरु गोविंद सिंह के जीवन और कार्यों से समूचे धर्म का जगत सदैव प्रेरित और संकल्पित होता रहेगा ।
सिखों के नवम गुरु तेगबहादुर और माता गूजरी के घर पौष शुक्ल सप्तमी 1723 विक्रमी तदनुसार 22 दिसंबर 1666 को एक दीपक प्रदीप्त हुआ जिसका नाम रखा गया गोविंद राय।गुरु गोविंद राय एक महान योद्धा, सच्चे देशभक्त, कवि और आध्यात्मिक नेता के रूप में विख्यात हुए। सन 1699 में बैशाखी के दिन उन्होंने खालसा पंथ की स्थापना की यह दिन सिखों के इतिहास का सबसे महत्त्वपूर्ण दिन माना जाता है।यहीं से उन्होंने अपना नाम गोविंद राय से बदलकर गोविंद सिंह घोषित किया। गुरु गोविंद सिंह सिख खालसा सेना के संस्थापक और पहले सेनापति भी थे।
माता जीतो, माता सुंदरी और माता साहिब देवा उनकी तीन पत्नियाँ थीं।अजीत सिंह, जुझार सिंह, जोरावर सिंह और फतेह सिंह उनके चार पुत्र थे। अपने 42 वर्ष के जीवन काल में गुरु गोविंद सिंह ने 14 युद्ध लड़े।उन्होंने मुग़लों और उनका साथ दे रहे शिवालिक पर्वतों के सम्राटों के साथ युद्ध किए।उनके सर्वोच्च शौर्य और बलिदान की कोई अन्य मिसाल नहीं।उनका प्रेरक वाक्य आज भी भारतीय सेना का सम्बल सूक्त है –
‘देह शिवा बर मोहे इहे शुभ क़रमन ते कभुँह न टरौं।न ड़रौं अरि सौं जब जाय लडौं, निश्चय कर अपनी जीत करौं।’
हज़ारों काश्मीरी पंडितों और देश भर के हिंदुओं की रक्षा का संकल्प लेते हुए गुरु गोविंद सिंह जी के पिता गुरु तेगबहादुर ने तत्कालीन मुग़ल बादशाह औरंगज़ेब का डटकर सामना किया।औरंगज़ेब ने धोखे और फ़रेब से गुरु तेगबहादुर को बंदी बना लिया।इस्लामी आतंक की पूरे भारत में एक दहशत व्याप्त हो सके ,इस उद्देश्य से औरंगज़ेब ने 11 नवम्बर 1675 को गुरु तेगबहादुर की चाँदनी चौक पर सर कलम करके हत्या कर दी।इसके बाद ही 9 वर्षीय गोविंद राय को दसवें गुरु के रूप में प्रतिष्ठित किया गया। गुरु तेगबहादुर ने हिंदुत्व की रक्षा के लिए जो किया इसी से उन्हें हिंद की चादर की उपाधि से विभूषित किया गया।अर्थात् ऐसी दिव्य आत्मा जिसने धर्म की अस्मिता क़ो ढकने के लिए स्वयं को क़ुर्बान कर दिया।
गोविंद राय बचपन से ही विलक्षण व्यक्तित्व के स्वामी थे।चार वर्ष की अवस्था से ही उन्होंने फ़ारसी और संस्कृत भाषाओं की पढ़ाई शुरू कर दी थी।18 वर्ष की आयु में गोविंद राय ने ‘चण्डी दी वार’ की रचना की।वे एक श्रेष्ठ कवि, लेखक और संत योद्धा के रूप में विख्यात हुए।उन्हें अरबी, फ़ारसी, हिंदी, गुरमुखी, अवधी और बृज भाषाओं पर समान अधिकार था।उनका बचपन आनन्दपुर साहिब और पौंटा साहिब के इर्द गिर्द बीता।उन्होंने अपनी रचनाधर्मिता से देशप्रियता और धार्मिक संस्कारों की एक नयी लहर का सूत्रपात किया।उनके विद्या दरबार में भारतीय भाषाओं के 52 कवि थे।
इन सभी ने गुरु गोविंद जी से प्रेरणा लेकर अमर संस्कृत साहित्य और धार्मिक देशनाओं का हिंदी और पंजाबी में अनुवाद किया । भारतीय साहित्य के इतिहास में इस योगदान को ठीक से समझा और परखा नहीं गया । यह आत्मिक क्रांति से ओतप्रोत एक ऐसा साहित्यिक पुनर्जागरण था जिसने कर्म और धर्म को नए दृष्टिकोण से देखने की समझ का विकास किया। इस साहित्य ने कई पीढ़ियों को ऊर्जस्वित किया। भक्ति क़र्म के साथ एकाकार हुई और कर्म राष्ट्रीय सुख दुःख का हिस्सा बनकर आम आदमी के जीवन को प्रभावित करने लगा।
गुरु गोविंद सिंह ने एक निरंकार परमात्मा के गुणवाचक नामों का संकलन तैयार किया जिसको ‘ जाप साहिब’ के नाम से जाना जाता है। अकाल पुरख की स्तुति और कर्मकांड में व्याप्त कुरीतियाँ पर चोट करते हुए उनकी कालजयी रचना है ‘ अकाल उस्तत:’ उन्होंने अपनी आत्मकथा ‘विचित्र नाटक’ में उस समय की परिस्थितियों और धार्मिक पतन के कारणों की ओर संकेत किया है।इसमें आत्मिक वंशावली भी सन्नहित है। ‘चण्डी चरित्र’ पर उनकी चार रचनाएँ है।अपनी रचनाओं में देवी स्तुति को उन्होंने परम सत्ता से एकलय किया है ।चण्डी को परमेश्वर की परम शक्ति के रूप में निरूपित किया गया है।इनमें एक रचना ‘ मार्कण्डेय पुराण’ से अभिप्रेरित है।
हिंदू धर्म की प्राचीन अवधारणाओं से गुरु गोविंद जी गहरे जुड़े रहे ।शिव और महाकाली की शक्ति को वे सदैव मानते रहे।उत्तराखंड में स्थित हेमकुंड साहिब में अपने प्रवास का उल्लेख करते हुए गुरु गोविंद जी लिखते हैं -सप्तपर्वत होवत हैं जहां, दस सिंह सोवत हैं जहाँ, तहाँ हम घोर साधना साधी महाकाल कालिका अराधी।’
‘शास्त्रनाम माला’ में अस्त्र शस्त्रों के रूप में गुरमत की व्याख्या की गयी है।हमारा मन मस्तिष्क और बुद्धि के चाल चलन पर आधारित रचना का नाम है ‘ अथ पख्यां चरित्र लिख्यते’ । खालसा की परिभाषा और खालसा के कृतित्व पर ‘खालसा महिमा’ में शिष्यों के कर्तव्यबोध और धर्म के मार्ग पर त्याग की महिमा को वर्णित किया गया है।
17 दिसंबर 1704 को औरंगज़ेब ने गुरु गोविंद सिंह के दो छोटे पुत्रों जोरावर सिंह और फतेह सिंह को ज़िंदा दीवार में चुनवा दिया।जिससे वो शहीद हो गये।जब इसकी सूचना गुरु गोविंद सिंह को मिली तो उन्होंने औरंगज़ेब क़ो एक पत्र लिखा।इस पत्र को ‘ जफरनामा’ (विजय की चिट्ठी) कहा जाता है।इस पत्र में उन्होंने औरंगज़ेब को चेतावनी देते हुए कहा था कि मेरे दो बेटों की हत्या से तुम हमें हमारे धर्म के पथ से विमुख नहीं कर सकते।जल्दी ही खालसा के रूप में देश के लिए क़ुर्बान होने वाले मेरे हज़ारों बेटे तैयार हो रहे हैं।
जिस स्थान पर इन सिंह पुत्रों की शहादत हुई वह स्थान सरहिंद (पंजाब) ज़िला फतेहगढ़ में है।उसी भूमि पर दोनों साहबज़ादों के अंतिम संस्कार के लिए जगह देने से तत्कालीन मुस्लिम बादशाह ने इनकार कर दिया।गुरु गोविंद जीं के एक शिष्य सेठ दीवान टोंडरमल के अनुरोध करने पर बादशाह ने एक विचित्र शर्त रख दी।उसने कहा कि वह इस स्थान पर सोने की मोहरें बिछाएँ जितनी जगह सोने से ढक जाएगी उतनी जगह आपकी।सेठ ने शर्त स्वीकार कर ली।बैलगाड़ी में लादकर लायी गई स्वर्ण मुद्राओं को देखकर मुस्लिम बादशाह का ईमान डोल गया। उसने कहा मुद्राओं क़ो बिछाकर नहीं बल्कि खड़ी करके जगह को मांपा जाएगा।
सेठ टोंडरमल ने ऐसा ही किया।अंतिम संस्कार के लिए यह चार वर्ग गज ज़मीन 78 हज़ार स्वर्ण मुद्राओं में ख़रीद ली गई।सोने की क़ीमत के हिसाब से इस चार गज ज़मीन के टुकड़े की क़ीमत आज दो अरब पचास करोड़ रुपए बनती है। समूची दुनिया में सबसे महँगी जगह ख़रीदने का इतिहास सिख समुदाय के नाम दर्ज है।तीन सौ साल बाद भी आज तक दुनिया भर में इतनी महँगी जगह कहीं नहीं ख़रीदी जा सकी।
जब यह वृतांत गुरु गोविंद सिंह को सुनाया गया और उनके सम्मुख सेठ टोंडरमल को प्रस्तुत किया गया तो विशेष अरदास में सेठ से गुरु जी ने कुछ माँगने के लिए कहा।
इसपर सेठ टोंड़रमल के वक्तव्य ने उन्हें दान की परम्परा का सिरमौर बना दिया, सेठ का उत्तर था-‘ गुरु जी यदि आप अपनी अरदास के आशीर्वाद स्वरूप मुझे कुछ देना ही चाहते हैं , तो ये आशीष दें कि मेरे घर कोई औलाद न हो।क्योंकि मैं नहीं चाहता कि मेरे इस कृत्य को मेरी आने वाली सन्तानें अपनी शेखी बघारते हुए दुनिया के सामने गाती फिरें।मेरा गुरु के लिए किया गया यह दान बस मेरे ही साथ चला जाये!’
ऐसा ही हुआ भी सेठ टोंडरमल निसंतान ही रहे।दो केले और एक कम्बल को किसी गरीब को देते हुए पाँच समाजसेवियों के चित्र खिंचवाने की ललक के मुँह पर यह घटना एक करारा तमाचा है।जो दान की दिव्यता को परिभाषित करती है।
वीरत्व की पराकाष्ठा गुरु गोविंद सिंह ने 6 दिसंबर 1704 को चमक़ौर के युद्ध में अविश्वसनीय युद्ध कौशल का परिचय दिया।गुरु गोविंद सिंह के नेतृत्व में मात्र 42 सिख सैनिकों ने 10 लाख मुग़ल सैनिकों का सामना किया।सरविहीन धड़ों को लड़ते देख मुग़ल सेना में भगदड़ मच गई।मुग़ल योद्धा वज़ीर खान अपनी पराजय मानते हुए भाग खड़ा हुआ।औरंगज़ेब को इस शिकस्त से गहरा सदमा पहुँचा और कुछ ही समय बाद उसकी मृत्यु हो गई।इस संग्राम में गुरु गोविंद सिंह जी के शब्द आज भी थके हारे मानव मन में एक नई चेतना और ऊर्जा का संचार करते हैं। यथा-
‘चिड़ियाँ ते मैं बाज लड़ावाँ, गीदड़ नू मैं शेर बनावाँ ।सवा लाख से एक लड़ावाँ ,तब गोविंद सिंह नाम कहावाँ।’
औरंगज़ेब की मौत के बाद गुरु गोविंद सिंह ने बहादुरशाह ज़फ़र को बादशाह बनाने में मदद की।बहादुर शाह ज़फ़र और गुरु गोविंद के मध्य मधुर सम्बन्धों को देखकर सरहद का नवाब वजीत खां घबरा गया।उसने दो पठान गुरु गोविंद सिंह के पीछे लगा दिए । इन पठानों ने गुरु गोविंद सिंह पर धोखा देकर वार किया।जिससे 7 अक्तूबर 1708 को नांदेड़ साहिब में दिव्य ज्योति समा गयी अनंत विस्तार में और अपने पीछे छोड़ गयी प्रेरणा और महानता का एक विराट पुंज।
गुरु गोविंद सिंह ने अपने बाद महान ग्रंथ ‘गुरु ग्रंथ साहिब’ को ही अपने उत्तराधिकारी के रूप में प्रतिष्ठित किया।सिख पंथ के प्रवर्तक गुरु गोविंद सिंह ने उनके बाद “गुरु ग्रंथ साहिब”को ही आगे से गुरु शोभित किया। जब भी भारतीय संस्कृति, अध्यात्म, धर्म, साहस और प्रेरणा का इतिहास लिखा जाएगा उसमें गुरु गोविंद सिंह का नाम स्वर्ण अक्षरों में अंकित रहेगा।


