नई दिल्ली। अपने बयानों से अपनी ही पार्टी पर निशाना साधने वाले वरुण गांधी कांग्रेस का हाथ थाम सकते हैं। वह भाजपा में काफी समय से उपेक्षित महसूस कर रहे थे। सूत्रों की माने तो वह जल्द ही भारत जोड़ो यात्रा में शामिल हो सकते हैं। इसे पूरे परिवार को एकजुट होने के तौर पर ेदेखा जा रहा है।

इसके संकेत राहुल गांधी ने पहले ही दे दिए थे। उन्होंने कहा था कि अगर वरुण गांधी चाहें तो भारत जोड़ो यात्रा में शामिल हो सकते हैं। उनका हम सभी स्वागत करेंगे। वहीं अपने बयानों से वरुण भी भाजपा के लिए मुसीबत पैदा करते रहे हैं। शायद इसीलिए पार्टी ने भी उन्हें किनारे कर दिया।

जिससे पार्टी को लेकर उनकी तल्खी और बढ़ गई। ऐसे में माना जा रहा है कि 2024 के चुनाव से पहले वरुण गांधी राहुल के साथ आ सकते हैं। वरुण गांधी ने भी एक सभा में इसके संकेत दे दिए थे। उन्हांेने कहा था कि मैं ना कांग्रेस के खिलाफ हूं ना पंडित नेहरू के खिलाफ हमारे देश की राजनीति देश को जोड़ने की होनी चाहिए ना कि गृहयुद्ध पैदा करने की। आज जो लोग केवल धर्म और जाति के नाम पर वोट ले रहे हैं उनसे हम रोजगार शिक्षा, चिकित्सा का सवाल तो पूछें।

बता दें कि आपातकाल के बाद 1970 में जब इंदिरा गांधी सत्ता से बेदखल हो गई तो मेनका गांधी ही थी जो उस वक्त सूर्य मैगजीन निकालती थीं अपनी सास के विरोध को लेकर उन्होंने खूब आर्टिकल लिखे। उसी से साफ था कि मेनका की दिलचस्पी राजनीतिक में थी लेकिन 1980 में संजय की आकस्मिक मौत के बाद जब इंदिरा ने तवज्जो बड़े बेटे राजीव को दी, तो मेनका ने अपने बेटे वरुण को लेकर अलग राह चुनी।

1982 में मेनका गांधी ने प्रधानमंत्री आवास छोड़ दिया, मेनका ने अगले साल अकबर अहमद के साथ मिलकर राष्ट्रीय संजय मंच नाम से पार्टी बना ली। इसी के साथ इंदिरा के घर में मेनका की वापसी के रास्ते बंद हो गए। इसके बाद 1999 में मेनका ने बीजेपी के टिकट पर पीलीभीत से बंपर जीत हासिल की।

बीजेपी को भी लगा कि उनके पास भी गांधी है, लेकिन कहते हैं ना समय कभी नहीं रुकता। समय बदला और बीजेपी की भी मांग बदली। वरुण गांधी और मेनका गांधी का गांधी प्रेम वहीं का वहीं रहा। वरुण गांधी बीजेपी में साल 2004 में शामिल हुए थे। उस समय बीजेपी के मुख्य रणनीतिकार और पार्टी के बड़े नेता लालकृष्ण आडवाणी का उन्हें पूरा समर्थन था। वजह थी वह पढ़े लिखे थे। जबरदस्त भाषण देते थे और गांधी परिवार के चेहरों को टक्कर देकर चुनाव भी जीते थे। जब बीजेपी की कमान राजनाथ सिंह के हाथ में थी उस वक्त पार्टी में उनका कद भी ठीक था।

पार्टी महासचिव और बंगाल के प्रभारी भी थे। कहा जाता है कि उनका कद उसी दिन से खत्म होने लगा था जब उन्होंने राजनाथ की तुलना अटल बिहारी वाजपेई से कर दी थी। 2013 के आस.पास की बात है मतलब राजनाथ में उन्हें अगला प्रधानमंत्री दिखने लगा था, लेकिन बीजेपी में रहकर ऐसे फैसले खुद नहीं ले सकते थे उस वक्त तक नरेंद्र मोदी गेम से बाहर थे लेकिन जैसे ही नरेंद्र मोदी गेम में आए वरुण गांधी और मेनका गांधी का गेम बिगड़ने लगा।

बीजेपी को पहले गांधी सरनेम की जरूरत थी मोदी लहर ने उस सोच को ही बदल दिया पहले लगता था कि गांधी के नाम से ही वोट मिल जाता हैं, लेकिन नरेंद्र मोदी ने इस धारणा को ही मिटा दिया। जानकार घटना का भी जिक्र करते हैं जब वरुण गांधी बंगाल के प्रभारी थे और 2014 के लिए नरेंद्र मोदी की एक रैली हुई थी तब दावा किया गया था कि करीब दो लाख का समर्थन मिला है। न जिम्मेदारी वरुण गांधी पर ही थी।

वे सामने आए और कह दिया ये झूठ है सिर्फ 40 से 50 हजार लोग ही रैली में पहुंचे थे। बस इसी दिन से वरुण गांधी और मेनका गांधी मानो साइडलाइन हो गए। इसके बाद जब 2014 में अमित शाह पार्टी के अध्यक्ष बने तो वरुण गांधी को महासचिव पद से हटा दिया गया। 2019 में नड्डा अध्यक्ष बने तो मां.बेटे दोनों को कार्यकारिणी से भी आउट कर दिया गया।

वरुण गांधी और मेनका गांधी बस नाम के ही अब बीजेपी में हैं ऐसा समझिए कि बीजेपी या तो जल्दी दोनों को बाहर करेगी या दोनों खुद फैसला लेंगे क्योंकि धीरे.धीरे इनसे सब कुछ छीन गया है। मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में वह मंत्री थी लेकिन 2019 में उन्हें मंत्रिमंडल से भी बाहर कर दिया गया।

2022 के किसी भी चुनाव में मां.बेटे को प्रचार में नहीं भेजा गया, जबकि वरुण गांधी एक वक्ता के रूप में इतने प्रभावशाली तो है कि उन्हें प्रचार की जिम्मेदारी दी जाए। ऐसे में वरुण गांधी के पास चार ऑप्शन है सपा आरएलडी कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस हालांकि अखिलेश यादव वरुण गांधी की ही तरह विरासत में विश्वास रखते हैं ऐसे में अगर वह सपा में आते हैं उन्हें अखिलेश से ज्यादा लाइमलाइट मिलती है तो सपा सुप्रीमो को दिक्कत भी हो सकती है।