- शिंदे गुट का ‘ऑपरेशन टाइगर’ सक्रिय
दिल्ली में बढ़ी सियासी हलचल, सांसदों के बागी होने की खबर
मुंबई/दिल्ली । Maharashtra Political Crisis महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर भूचाल आ गया है। साल 2022 में महाविकास अघाड़ी (MVA) सरकार गिरने और पार्टी के विभाजन के बाद, अब उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना (UBT) को एक और तगड़ा झटका लगने के आसार दिख रहे हैं। माना जा रहा है कि उद्धव गुट के कई लोकसभा सांसद पाला बदलकर मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली मूल शिवसेना में शामिल हो सकते हैं। इस संभावित दलबदल को शिंदे गुट की ओर से “ऑपरेशन टाइगर” का नाम दिया गया है। वहीं संजय राउत का आरोप है कि टूटने वाले सांसदों को 15 करोड़ रुपये दिए गए हैं।
सूत्रों के मुताबिक, शिवसेना (UBT) के कुल 9 लोकसभा सांसदों में से 6 से 7 सांसद एकनाथ शिंदे गुट के संपर्क में हैं। संसद के आगामी सत्र से ठीक पहले इन सांसदों के दिल्ली पहुंचने और लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से मिलकर एक अलग गुट के रूप में मान्यता मांगने की अटकलें तेज हो गई हैं।
उद्धव ठाकरे द्वारा मुंबई के ‘मातोश्री’ में बुलाई गई आपात बैठक में केवल 4 सांसद ही उपस्थित हुए थे, जिसके बाद से ही इस टूट की चर्चाओं को बल मिला। इसके तुरंत बाद मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे और उद्धव गुट के कई असंतुष्ट सांसदों की दिल्ली में देर रात गुप्त बैठक होने की खबरें भी सामने आई हैं।
क्या है ‘ऑपरेशन टाइगर’ और दल-बदल का कानूनी गणित?
शिंदे गुट के नेताओं का दावा है कि उद्धव ठाकरे की कार्यशैली और वैचारिक बदलावों से उनके अपने ही जनप्रतनिधि नाखुश हैं। कानूनन रूप से दलबदल विरोधी कानून (10वीं अनुसूची) के तहत अयोग्यता से बचने के लिए किसी भी धड़े को विधायी दल के दो-तिहाई (2/3) सदस्यों के समर्थन की आवश्यकता होती है।
कानूनी समीकरण: चूंकि लोकसभा में उद्धव गुट के पास कुल 9 सांसद हैं, इसलिए यदि 6 सांसद एक साथ बगावत करते हैं, तो वे तकनीकी और कानूनी रूप से अयोग्यता से बचते हुए एकनाथ शिंदे की शिवसेना में खुद का विलय कर सकते हैं।
उद्धव गुट ने खटखटाया लोकसभा स्पीकर का दरवाजा
इस संभावित टूट की आहट से सहमे उद्धव ठाकरे गुट ने तुरंत जवाबी मोर्चा संभाल लिया है। पार्टी के वरिष्ठ नेता और संसदीय दल के नेता अरविंद सावंत ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को एक विस्तृत पत्र भेजा है। पत्र में सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए मांग की गई है कि:
- मूल राजनीतिक दल की अनुमति के बिना किसी भी अलग विधायी गुट या धड़े को संसद में मान्यता न दी जाए।
- 2003 के 91वें संविधान संशोधन के बाद केवल ‘विभाजन’ (Split) के आधार पर किसी भी गुट को सुरक्षा नहीं दी जा सकती, जब तक कि मूल पार्टी का ही विलय न हो जाए।
- पार्टी नेतृत्व को सुने बिना किसी भी बागी सांसद के आवेदन पर एकतरफा फैसला न लिया जाए।
संजय राउत का पलटवार: “यह सिर्फ पैसों का खेल है”
शिवसेना (UBT) के फायरब्रांड नेता और राज्यसभा सांसद संजय राउत ने इन खबरों को पूरी तरह खारिज करते हुए सत्तापक्ष पर तीखा हमला बोला है। राउत ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर लिखा, “यह बेहद चौंकाने वाला और घृणास्पद है कि महाराष्ट्र के सांसदों को खरीदने की कोशिशें की जा रही हैं। यह सब पैसों का खेल है।” राउत ने दावा किया कि उनके सभी सांसद एकजुट हैं और उन्होंने उद्धव जी के सामने वफादारी की कसम खाई है। शिंदे के ‘ऑपरेशन टाइगर’ के जवाब में राउत ने ‘ऑपरेशन वोल्फ’ (Operation Wolf) शुरू करने की चेतावनी दी है।

