क्या अपना बच्चा बेचना अपराध है

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दैनिक भास्कर एक बहुत प्रतिष्ठित अखबार है। दैनिक भास्कर में कल एक समाचार को संपादकीय के रूप में लिखा गया कि बिहार के एक गांव में एक गरीब महिला ने अपने बच्चे को पंद्रह सौ रुपये में किसी दूसरे व्यक्ति को बेच दिया। उस व्यक्ति के पास कोई संतान नहीं थी। यह मामला पुलिस में चला जाता है।

संपादकीय का आधार यह है कि आज भारत में इस प्रकार की मजबूरियां पैदा हो गई है कि बच्चे बेचे जाने लगे हैं। मैंने इस संपादकीय पर बहुत विचार किया। मुझे समझ में नहीं आया कि इसमें गलत क्या हुआ। किसी को अपने परिवार के लिए बच्चे की जरूरत थी, उसके सामने एक बच्चे की कमी थी, दूसरे परिवार को पैसे की जरूरत थी, जिस परिवार को बच्चे की जरूरत थी, उसने पैसा दिया और जिसको पैसे की जरूरत थी, उसने पैसा लिया इसमें गलत क्या हुआ। अखबार को संपादकीय लिखने की क्या जरूरत पड़ी।

अख़बार लिखता है कि इस प्रकार की मजबूरियों को दूर किया जाना चाहिए। तो क्या भारत में जिन लोगों के संतान नहीं है, उन लोगों को अब सरकार बच्चे मुफ्त में दे। या जो लोग अपने बच्चों का पेट नहीं भर पा रहे हैं, सरकार ले ले और उनकी मजबूरी दूर कर दे। इसमें सरकार कहां से आ गई । दो लोगों की मजबूरी है और दोनों अपनी मजबूरी को आपस में दूर कर ले रहे हैं तो इसमें दैनिक भास्कर के संपादक को क्या कठिनाई महसूस हो रही है।

मेरे विचार में तो इसमें किसी भी प्रकार का कुछ भी अनैतिक नहीं हुआ है। यदि 2 लोग अपनी आवश्यकताएं आपस में मिलकर पूरा कर लेते हैं तो इसमें नैतिकता अनैतिकता का मापदंड घुसाना बुरी आदत है। मैं फिर से कहना चाहता हूं की अगर किसी व्यक्ति के पास दो आंखें हैं किसी व्यक्ति के पास आंख नहीं है, यदि वह व्यक्ति ₹200000 लेकर अपनी एक आंख किसी को दे देता है। दोनों का अगर मजबूरी दूर हो जाती है। इसमें संपादक महोदय को क्या दिक्कत है। क्या संपादक महोदय या सरकार उस व्यक्ति की आंख लगवा दे। क्या सरकार का यही काम है कि वह अंधे को आंख दें और भूखे को भोजन दें। मैं समझता हूं कि यदि समाज के दो प्रकार के लोग आपस में मिलकर अपनी अपनी आवश्यकताएं बदल लेते हैं इसमें कुछ भी अनैतिक नहीं है।

बच्चा बेचने वाली महिला के पक्ष में नकली आंसू बहाने वाले बहुत मिले किसी ने यह नहीं कहा कि उस महिला की मजबूरी दूर करने के लिए वे क्या कर सकते हैं। आगे इस प्रकार की घटना ना हो इसके लिए इनके पास क्या तैयारी है। थूक लगाकर आंसू दिखाने का नाटक करने वाले आपको फेसबुक पर बहुत मिल रहे हैं लेकिन वास्तविक मदद करने वाले नहीं एक ने भी यह नहीं। कब बताया कि जिस व्यक्ति ने पैसा देकर के बच्चे को गोद लिया उसकी मजबूरी दूर कैसे हो सकती है। वह उसमें क्या मदद कर सकते हैं। क्या वह अपने बच्चों में से एक बच्चा उसको गिफ्ट में दे सकते हैं। नकली आंसू बहाने वाले बहुत मिलेंगे अगर कोई मदद करने वाला दिखे तो समझ में आये।

bajrang muni
बजरंग मुनि
लेखक के अपने स्वतंत्र विचार हैं

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