मेरठ । विधानसभा कैंपेन के दौरान ऐसा अनुमान लगाया जा रहा था कि भाजपा को किसानों के गुस्से का सामना करना पड़ेगा। अनुमान ये भी थे कि किसानों के इस गुस्से का फायदा जयंत चौधरी की पार्टी रालोद को उत्तरप्रदेश में होगा। हालांकि नतीजे इससे बिल्कुल उल्टे आए। ऐसे में अब सवाल ये उठ रहे हैं कि जयंत और उनकी पार्टी का भविष्य क्या होगा, एक आकलन ये है कि हो सकता है कि जयंत चौधरी फिर से बीजेपी के पास वापस आ जाएं। बीजेपी ने भी उन्हें कभी पूरी तरह से ख़ारिज़ नहीं किया। पेश है हरिओम ठाकुर की रिपोर्ट।

विधानसभा चुनाव 2022 में रालोद और सपा का गठबंधन बना और इसमें बाहर से जुड़े भाकियू के राकेश टिकैत। इसके बाद माना जाने लगा कि इन तीनों की जुगलबंदी से भाजपा को कम से कम पश्चिमी उत्तरप्रदेश में करारा नुकसान होगा। इसके पीछे कारण भी थे। क्यों किसान आंदोलन के चलते किसान यानि जाट बीजेपी से खफा हैं। ऐसा माना जा रहा था। इसके बाद जिस तरह का माहौल पूरे उत्तर प्रदेश में बनाया गया उससे ये लगने लगा कि यूपी में सपा की सरकार बननी बिल्कुल तय है। इधर जयंत चौधरी की एक मजबूरी थी और वो यह कि उन्हें पार्टी का वजूद बचाए रखने के लिए एक सहारे की आवश्यकता थी।

जयंत को वो सहारा अखिलेश में दिखा। हालांकि वह बीजेपी से भी हाथ मिला सकते थे, लेकिन शायद यहां वह आकलन करने में चूक गए। क्योंकि न तो किसान आंदोलन का असर दिखा और न ही जाटों की नाराजगी दिखी। इसके पीछे कारण यह भी माना जा रहा है कि भाजपा ने स्थिति को भांपते हुए चुनाव से ठीक पहले कृषि कानून वापस ले लिया। इसका नुकसान जयंत कों उठाना पड़ा।

क्योंकि जब चुनाव परिणाम सामने आए तो जो इन लोगों ने सोचा था वैसा कुछ हुआ नहीं। बीजेपी को पश्चिमी यूपी में भी करीब 40 प्रतिशत वोट जाटों का मिला। अब यहां एक दिलचस्प पहलू यह भी है कि भाजपा को जाटों का वोट वहीं मिला जहां सपा ने मुस्लिम प्रत्याशी उतारे थे। इससे साफ हो गया कि इस चुनाव में जो जाट मुस्लिम गठजोड़ बनाने की कोशिश की गई थी वो सफल नहीं हो सकी। मतलब साफ है कि मुस्लिमों ने तो जाट प्रत्याशी को वोट दिए, लेकिन जाटों ने मुस्लिम प्रत्याशी को वोट नहीं दिया यानि कि जाटों ने सीधे तौर पर मुस्लिमों के साथ धोखा किया।

अब सवाल यह उठता कि इससे अलग अगर जयंत ने बीजेपी के साथ हाथ मिलाया होता तो क्या होता। शायद पश्चिमी यूपी में रालोद को और सीटें मिलतीं और इस गठबंधन का करीब 90 प्रतिशत सीटों पर कब्जा हो जाता। तब प्रदेश सरकार में जयंत उप मुख्यमंत्री भी हो सकते थे। खैर अब यह वापस नहीं हो सकता है। अब नजरें 2024 के लोकसभा चुनाव पर टिकी हैं। यहां जयंत की भी मजबूरी है और भाजपा की भी।

यदि दोनों एक साथ आ जाते हैं तो यहां की करीब दो दर्जन सीटों पर इनको बढ़त मिल सकती है। इसके पीछे एक बड़ा कारण ये भी है कि लोकसभा में सपा के साथ चुनाव लड़ने से कम से कम जयंत को कुछ हासिल नहीं होने वाला है। ऐसे में जयंत के लिए एक ही विकल्प बचता है कि वह भाजपा के साथ मिल जाएं। दूसरा कारण यह भी कि मुस्लिम मतदाता यह समझ चुके हैं कि विधानसभा चुनाव में मुस्लिम प्रत्याशी को जाटों ने वोट नहीं किया, ऐसे में अगर उन्होंने लोेकसभा चुनाव में जाट प्रत्याशियों से किनारा कर लिया तो फिर उनका क्या होगा। ऐसे में बुदिृधमानी और राजनीति यही कहती है कि जयंत को भाजपा से हाथ मिला लेना चाहिए।