नैनीताल। पिथौरागढ़ में तीन देशों भारत, नेपाल और तिब्बत सांस्कृतिक और व्यापारिक पहचान का प्रतीक जौलजीबी मेले का इतिहास अति वैभवशाली रहा है।यह उत्तर भारत के प्रमुख मेलों में शामिल है। काली और गोरी नदी के संगम पर होने वाले जौलजीबी के ऐतिहासिक मेले की पहचान आज भले ही व्यापारिक मेले के रूप में हो परंतु इसकी शुरुआत 150 साल पहले धार्मिक मेले के रूप में की गई थी। वर्ष 1871 में ज्वालेश्वर शिव मंदिर की स्थापना के समय अस्कोट रियासत के राजा पुष्कर पाल ने मेले की शुरुआत की थी।
ज्बालेश्वर मंदिर में मार्गशीर्ष संक्रांति को मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा की गई थी। उसी दिन से जौलजीबी मेला शुरू हुआ। हर साल मार्गशीर्ष संक्रांति पर यहां मेला लगने लगा। धीरे धीरे मेले में तिब्बत से व्यापारी आने लगे। ऊनी कपड़ों के साथ ही शहद, घी, बर्तन, हुमली जुमली के घोड़ों की इस मेले में सबसे अधिक मांग रहती थी। वर्ष 1962 की भारत-चीन लड़ाई से पहले तक तिब्बती व्यापारियों का आना-जाना जारी रहा। इस युद्ध के बाद तिब्बती व्यापारियों का मेले में आना बंद हो गया। बुजुर्गों के अनुसार प्राचीन समय में देशभर से व्यापारी जौलजीबी मेले में आते थे। नेपाल के हुमला, जुमला के घोड़ों को खरीदने के लिए उत्तर प्रदेश के विभिन्न शहरों से लोग जौलजीबी पहुंचते हैं। राजा पुष्कर पाल के बाद राजा गजेंद्र पाल, राजा विक्रम बहादुर पाल ने मेले का संचालन किया।

वर्ष 1938 में राजा विक्रम बहादुर पाल का निधन हो गया। उस समय युवराज टिकेंद्र बहादुर पाल नाबालिग थे। युवराज के नाबालिग होने के कारण वर्ष 1947 तक अस्कोट रियासत का संचालन अंग्रेजों ने किया। 1947 से 52 तक अस्कोट रियासत का संचालन भारत सरकार ने किया। वर्ष 1953 में युवराज टिकेंद्र के बालिग होने पर उन्हें राजगद्दी सौंपी गई। 11 नवंबर 1967 को टिकेंद्र के राजा रहते रियासत का भारत में विलय हो गया। वर्ष 1975 से जौलजीबी मेले को सरकारी मेला घोषित किया गया। अब सरकारी मेला एक सप्ताह तक चलता है जबकि व्यापारिक गतिविधियां 10 दिनों तक चलती हैं। नेपाल के घी और अल्मोड़ा की मिठाई की रहती थी मांग
प्राचीन समय में जौलजीबी मेले में नेपाल से घी और अल्मोड़ा के जोगा लाल साह की मिठाई की खूब मांग रहती थी। बुजुर्ग बताते हैं कि मथुरा, अल्मोड़ा, चंपावत से पीतल, कांसे, तांबे के बर्तन बेचने व्यापारी मेले में आते थे। जो बर्तन नहीं बिक पाते थे, उन्हें राजा खरीद लेते थे। इस प्रकार व्यापारियों का पूरा सामान बिक जाता था। उस समय पाल राजा नेपाल से आने वाले मेलार्थियों की आवाजाही के लिए काली नदी में अस्थायी पुल का निर्माण कराते थे। पहले जौलजीबी मेले में सेना की भर्ती होती थी। वर्ष 1957 तक जोग्यूड़ा के व्यापी सेना मैदान में भर्ती मेला लगता था।
मेले में गर्म कपड़े और जड़ी बूटियों की भी बिक्री होती है। मेले में ऊन से बने दन, चुटके, थुलमे, कंबल, स्वेटर के अलावा लकड़ी के बर्तन, कृषि यंत्र, जड़ी बूटी सहित कई अन्य सामान उपलब्ध रहता है। हालांकि अब हल्के कपड़ों की अधिक मांग रहने से परंपरागत तरीके से ऊन से बने गर्म कपड़ों की मांग घट गई है। हुमली जुमली के घोड़ों की बिक्री भी पहले की अपेक्षा कम होती है।

