नई दिल्ली। आज राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों (एनएसए) के तीसरे क्षेत्रीय सुरक्षा संवाद में चीन और पाकिस्तान की अनुपस्थिति के बावजूद भारत, अफगानिस्तान के संदर्भ में कई कूटनीतिक मकसदों को पूरा करने में कामयाब रहा। खासतौर पर दिल्ली घोषणा पत्र के जरिए भारत जहां अफगानिस्तान में पाकिस्तान की भूमिका को संदेह के घेरे में लाने में सफल रहा, वहीं ईरान सहित अफगानिस्तान के ज्यादातर पड़ोसियों को भी साधने में कामयाब रहा।
पूर्व विदेश सचिव शशांक के मुताबिक अफगानिस्तान के संदर्भ में भारत ने पहली बार मजबूत कूटनीतिक पहल की। एक तरह से दुनिया को यह संदेश भी दिया कि अफगानिस्तान के मामले में भारत के महत्व की अनदेखी नहीं की जा सकती और यह भी कि अफगानिस्तान में हुए बदलाव पर खुद पर पड़ने वाले असर को लेकर भारत चुप नहीं बैठ सकता। पूर्व विदेश सचिव ने हालांकि कहा कि यह पहल सिर्फ कांफ्रेंस टू कांफ्रेंस या स्टेटमेंट टू स्टेंटमेंट नहीं होनी चाहिए, बल्कि जमीनी स्तर पर भी इस दिशा में पहल होनी चाहिए।
अफगानिस्तान मुद्दे पर ईरान को साधना बेहद अहम है। अमेरिका से टकराव के कारण ईरान के रिश्ते भारत से बेहद खराब हो गए थे। उसकी चीन और पाकिस्तान से नजदीकियां बढ़ गई थीं। मगर अफगानिस्तान मामले में ईरान ने भारत की चिंताओं पर खुलकर सहमति जताई है। खास बात यह है कि चीन और पाकिस्तान को छोड़ कर अफगानिस्तान के अन्य पड़ोसी देशों ने वहां पाकिस्तान के दखल पर चिंता जाहिर की हैं।
दिल्ली घोषणा पत्र में कई ऐसे बिंदु जोड़े गए हैं जो इशारा करते हैं कि अफगानिस्तान में पाकिस्तान की भूमिका से स्थितियां बिगड़ रही हैं। मसलन घोषणा पत्र में आठ देशों ने अफगानिस्तान को आतंकवाद का गढ़ न बनने देने का संकल्प लिया है। इसमें अफगानिस्तान में एक खुली और समावेशी सरकार बनाने की आवश्यकता पर बल दिया गया।
दिल्ली घोषणा पत्र का तालिबान ने स्वागत किया है। तालिबान के प्रवक्ता सुहैल शाहीन ने कहा कि हमने अफगानिस्तान पर भारत की मेजबानी में हुई बैठक को सकारात्मक कदम के रूप में देखा है। प्रवक्ता ने अफगानिस्तान को आतंकवाद के इस्तेमाल नहीं करने संबंधी घोषणा पत्र में किए गए आह्वान से भी सहमति जताई। गौरतलब है कि वहां सत्ता परिवर्तन के बाद अफगानिस्तान ने कई बार भारत से विकास कार्य जारी रखने की अपील की है।
