लधौनधूरा मेला : यहां देव डोले की रक्षा करते हैं अनुसूचित जाति के लोग

नैनीताल। चंपावत जिले के पाटी विकासखंड के लधौनधूरा में कार्तिक पूर्णिमा पर लगने वाला मेला धार्मिक सद्भावना के साथ ही समतामूलक समाज का संदेश भी देता है। शताब्दियों से आस्था और विश्वास की अनूठी परंपरा लोगों को लधौनधूरा में खींचकर लाती है। कार्तिक पूर्णिमा को निकलने वाले देव डोले की रक्षा अनुसूचित जाति के लोग करते हैं, जो हाथों में डंडे लेकर डोले के आगे चलते हैं।

डोले के डंडियाल भी अनुसूचित जाति के लोग ही होते हैं जबकि देव डोले के छड़ीदार खरही और बिरगुल ग्राम पंचायत के क्षत्रिय होते हैं और पुजारी मूलरूप से बैजगांव के ब्राह्मण होते हैं। पहाड़ की चोटी पर बसे लधौनधूरा का महत्व भगवान शिव के साथ जुड़ा है। यहां पर प्राकृतिक रूप से बना शिवलिंग है, जिसके ऊपर छत नहीं है। संतान की कामना के लिए नेपाल तक के लोग यहां आते हैं और इसी कामना से महिलाएं घी का दीया जलाकर यहां रात्रि जागरण भी करती हैं।

इतिहासकार देवेंद्र ओली के अनुसार मुगलकाल में लधौनधूरा मंदिर का कर चुकाने में कई गांवों के लोगों ने मदद की थी। इन्हीं गांवों के सभी ग्रामीण मंदिर की पूजा के हिस्सेदार होते हैं। अतीत में चंद राजाओं ने इस स्थान की महत्ता को बनाए रखा। कहा जाता है कि इस स्थान पर शिकार करने की मनाही थी। इसके बावजूद शिकार के लिए यहां आया कोई राजा इस वीराने में भटक गया। किंवदंती है कि उसने भगवान का उपहास किया तो जहरीले बिच्छुओं ने उसे काट दिया।

भगवान पर आस्था जागने पर सारे बिच्छू उसे छोड़कर भाग गए। उसके बाद राजा ने मंदिर में चांदी का छत्र चढ़ाया, जो आज भी मौजूद है। मंदिर में चढ़ावे के रूप में स्थानीय कारीगरों की ओर से बनाई गई घंटियां अर्पित की जाती हैं, जो स्थानीय बोली में घाणी कहलातीं हैं। आस्था के साथ ही प्राचीन समय में यह मेला स्थानीय व्यापार का केंद्र भी था। लोग यहां के कृषि यंत्र और बांस से बनी वस्तुओं को खरीदने के लिए दूर-दूर से आते थे।

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