गाजियाबाद। जवाहर लाल नेहरू विश्व विद्यालय (जेएनयू) के सेंटर ऑफ सोशल मेडिसिन एंड कम्युनिटी हेल्थ एंड ट्रांस-डिसिप्लिनरी सेंटर फॉर सस्टेनेबिलिटी स्टडीज एवं यूनिवर्सिटी ऑफ ससेक्स ने गाजियाबाद की संस्था सेंटर फॉर वाटर पीस के सहयोग से यहां आरडीसी में एक संगोष्ठी का आयोजन किया। “ जनकल्याण के लिए गाजियाबाद की हरियाली : चुनौतियां और संभावनाएं ” विषय पर आयोजित इस गोष्ठी में विद्वान वक्ताओं ने महानगर में बढ़ते प्रदूषण और कम होती हरियाली पर गंभीर चिंता की। वक्ताओं ने कहा कि समय रहते पर्यावरण संरक्षण के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए तो जिले में स्थिति और भयावह हो सकती है।
मुख्य अतिथि दर्जा प्राप्त राज्यमंत्री डॉ. राजनारायण शुक्ला ने कहा कि बढ़ते शहरीकरण के कारण जिस तेजी से पेड़ पौधे कम हो रहे हैं उससे प्रदूषण का स्तर निरंतर बढ़ता जा रहा है। यही कारण है कि गाजियाबाद अक्सर देश के सर्वाधिक प्रदूषित शहरों में शुमार रहता है। गाजियाबाद जिले में तालाब लुप्त होते जा रहे हैं। वर्षाजल के संचयन की उचित व्यवस्था नहीं है।

पेड़-पौधों की पर्यावरण व स्वच्छ हवा के लिए क्या आवश्यकता है, यह सब जानते हुए भी प्रशासनिक स्तर पर अवहेलना हो रही है। कुछ प्रभावशाली लोग अपने क्रियाकलापों से पर्यावरण को बहुत नुकसान पहुंचा रहे हैं। हालांकि इस दिशा में कार्य हो रहा है। कई संस्थाएं भी आवाज उठा रहीं हैं। वर्तमान सरकार का भी इस ओर फोकस है। समाज भी जागृत हो रहा है। इस गंभीर समस्या पर सोचने वाले लोग भी बढ़ रहे हैं, लेकिन यह काफी नहीं है हमें दुबारा प्रकृति को ओर वापस आना होगा और उससे जुड़ना होगा। हमें पर्यावरण संरक्षण के लिए बड़ा प्रयास करना होगा और आम जनता को भी इसमें जोड़ना होगा। तभी इसके सकारात्मक परिणाम आएंगे।
जल वैज्ञानिक डॉ. उमर सैफ ने कहा कि अथॉर्टियां जो भी मास्टर प्लान या अन्य योजनाएं बनाएं वे पूरी तरह से जनमानस पर केंद्रित हों। अब तक जो प्लान बने हैं, उनमें इसका पूरा ध्यान नहीं रखा गया। कैसे सब नागरिकों को साफ हवा और साफ पानी मिले योजनाओं में इसे शामिल किया जाए। क्योंकि लोगों को सबसे पहले स्वच्छ हवा और स्वच्छ पानी चाहिए। हम जब सामूहिक रूप से शरीर में रहते हैं तो शहर भी एक शरीर हो जाता है। इस लिहाज से सोचने की जरूरत है। डॉ. सैफ ने सहारनपुर जिले में जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण कार्य संबंधी जानकारी भी विस्तार से दी।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए जेएनयू की प्रोफेसर डॉ. रितु प्रिया ने कहा कि गाजियाबाद में प्रदूषण की खतरनाक स्थिति को सभी जानते हैं। उनकी टीम ने अपने प्रोजेक्ट में गाजियाबाद के विभिन्न क्षेत्रों का सघन सर्वेक्षण किया है और उन स्थानों की पर्यावरणीय स्थिति को जाना है। जब पर्यावरण सही होगा तभी लोग स्वस्थ रह पाएंगे। इसलिए योजनाओं में पर्यावरण संरक्षण पर समुचित ध्यान देने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि आज की गोष्ठी बहुत सकारात्मक रही। उपस्थित प्रबुद्ध लोगों से उपयोगी सुझाव मिले हैं। इन सभी को वे अपनी टीम के शोध व सर्वे में शामिल करेंगी।
इससे पूर्व शुभम मिश्र और साहिल ने करैहड़ा, लोनी क्षेत्र के खानपुर गांव और ट्रोनिका सिटी इलाके में किए गए टीम के सर्वे की विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने बताया कि करैहड़ा और खानपुर में खेती की जमीन निरंतर घटने से हरियाली कम हो रही है। मास्टर प्लान का क्रियान्वयन भी इन स्थानों पर सही नहीं हुआ है। गंदे पानी की निकासी भी समुचित नहीं है। उद्योगों का रसायन मिश्रित पानी से भूजल को प्रदूषित कर रहा है। पतला की स्थिति अभी ठीक है वहां खेती की जमीन कम नहीं हुई है और बागान भी बने हुए हैं। उन्होंने कहा कि हरियाली को नजरअंदाज कर होने वाला विकास चिंताजनक है।
सेंटर फॉर वाटर पीस के समन्यवक संजय कश्यप ने जिले में पानी बचाने एवं उसे स्वच्छ रखने के लिए किए जा रहे कार्यों की जानकारी दी। उन्होंने गोष्ठी में आए लोगों का परिचय कराया और गोष्ठी का भी संचालन किया। जेएनयू की रमिला बिष्ट और पर्यावरणविद सुशील राघव भी मंचासीन रहे। पार्षद सुनील यादव, अविनाश अग्रवाल, संदीप त्यागी, अधिवक्ता प्रवीण कुमार, विजेंद्र त्यागी, मनु त्यागी, विक्रांत तोमर, जितेंद्र, आकाश वशिष्ठ, प्रदीप त्यागी, इलियास व आशीष आदि ने भी जिले में पर्यावरण संबंधी चुनौतियों और समस्याओं पर विचार व्यक्त किए। गोष्ठी में विभिन्न स्वयंसेवी संस्थाओं के पदाधिकारी कोरोना प्रोटोकॉल के साथ शामिल रहे।
पालक खाना खतरनाक !

गााजियाबाद। गोष्ठी में सर्वे रिपोर्ट की प्रस्तुति के दौरान यह तथ्य सामने आया कि अब करैहड़ा गांव में खेती बहुत कम हो गई है और वहां इस समय पालक की खेती की जा रही है। पालक उगाने के लिए गंदे नालों के पानी का प्रयोग किया जा रहा है। यह स्थिति खतरनाक है और इससे जनस्वास्थ्य पर असर पड़ सकता है। सर्वे रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि खानपुर गांव में प्रदूषित जल के कारण कैंसर के रोगी बढ़ रहे हैं।
अर्फोडेबिल हाउस न बनने से बढ़ी अवैध कॉलोनियां
गाजियाबाद। नोएडा में पर्यावरण संरक्षण के लिए काम करने वाले विक्रांत तोमर ने कहा कि एनसीआर में अवैध कॉलोनियों के विकसित होने का सबसे बड़ा कारण अर्फोडेबिल हाउसों का निर्माण नहीं होना है। उन्होंने बताया कि नोएडा, ग्रेटर नोएडा और गाजियाबाद आदि क्षेत्रों में बड़ी संख्या में नौकरीपेशा रहते हैं। इनमें बड़ी संख्या में कम आय वाले लोग हैं। ऐसे लोगों के लिए अर्फोडेबिल हाउस बनाए जाने चाहिए थे, लेकिन न अथॉर्टियों ने और न ही बिल्डरों ने इनका ध्यान रखा। यदि अर्फोडेबिल हाउस बनाए जाते तो लोग अपने बजट के हिसाब से उन्हें खरीदते और अवैध कॉलोनियों का विस्तार नहीं होता।

