लखीमपुर खीरी में जो घटना के पीछे की एक हकीकत यह भी

farmers protest

लखीमपुर खीरी में जो घटना घटी है। उस घटना का सीधा संबंध दो गुटों के बीच टकराव से है। मैं पहले भी लिख चुका हूं और फिर से मैं स्पष्ट करना चाहता हूं कि यह किसान आंदोलन है ही नहीं। यह सीधा-सीधा आंदोलन पंजाब का है।

पंजाब में विदेशों की मदद से खालिस्तानी यों ने किसानों के नाम पर आंदोलन शुरू किया। उस आंदोलन में हमारी भारत सरकार ने टिकैत को प्रवेश कराया और आंदोलन खालिस्तानी यों से निकलकर टिकैत के हाथ में आ गया। लखीमपुर खीरी की घटना भी कुछ इसी तरह की है जहां कुछ खालिस्तानी यों का भी आंदोलन में हाथ साफ साफ दिख रहा है और आंदोलन को निपटाने में टिकट भी सामने दिख रहे।

लखीमपुर खीरी उत्तर प्रदेश में है। पंजाब में नहीं लेकिन 8 मरने वालों में जो 2 तरह के लोगों के नाम सामने आ रहे हैं। उसमें अवश्य ही कुछ ना कुछ संदेह होता है। एक वीडियो में यहां तक दिखा की गाड़ी पर आक्रमण करने वाला तलवार लिए हुए हैं। गाड़ी पर आक्रमण करने वाले के शर्ट पर बब्बर खालसा का फोटो लगा हुआ है भिंडरावाले का फोटो लगा हुआ है। इसलिए इस आंदोलन को बहुत गंभीरता से समझने की आवश्यकता है यह बहुत संवेदनशील मामला है।

इस आंदोलन में सबसे ज्यादा बचकाना हरकत सुप्रीम कोर्ट ने की है 9 महीने पहले ही आंदोलन खत्म हो जाता लेकिन सुप्रीम कोर्ट की एक टिप्पणी ने ही शाहीन बाग को जिंदा किया और सुप्रीम कोर्ट की एक गलती से ही किसान आंदोलन को जिंदा किया। यह अवश्य है कि साइन बाग में भी 8 महीने बाद सुप्रीम कोर्ट को अपनी गलती सुधारनी पड़ी और इस किसान आंदोलन में भी सुप्रीम कोर्ट अपनी गलती सुधार रहा है। सुप्रीम कोर्ट को यह समझना चाहिए कि आंदोलन करना संवैधानिक अधिकार है।

मौलिक अधिकार नहीं किसी भी आंदोलन से किसी मौलिक अधिकार का हनन नहीं किया जा सकता। लेकिन मौलिक अधिकार की जगह संवैधानिक अधिकारों को प्राथमिकता देना यह पूरी तरह गलत है। अब सुप्रीम कोर्ट ठीक दिशा में सोच रहा है।

बजरंग मुनि
लेखक के अपने स्वतंत्र विचार हैं
advertisement at ghamasaana