आखिर क्यों भूल जाते हैं भारत के लाल लाल बहादुर शास्त्री जी को

shastri ji

भारत में आज गांधी जयंती बड़े हो धूमधाम से मनाई जा रही है लेकिन आज के दिन ही एक और महापुरुष ने जन्म लिया था लेकिन उस महापुरुष के इतिहास को उस महापुरुष के गौरवगाथा को उस महापुरुष के त्याग और बलिदान को उस महापुरुष के सादगी को इतिहास के पन्नों में दफन कर दिया गया हमे बचपन में स्कूलों में भी यह नहीं बताया गया कि आज ही के दिन एक और महापुरुष का जन्म हुआ था जिसका नाम लाल बहादुर शास्त्री है।

वहीं भारत के लाल लाल बहादुर शास्त्री है जिन्होंने भारत में हरित क्रांति को बढ़ावा दिया यह वही लाल बहादुर शास्त्री है जिन्होंने अमेरिका से आने वाले सड़े का आयात बन्द कर दिया था और आहान किया था हम एक समय खाना खाएंगे और हफ्ते में दिन का 1 उपवास रखेंगे। ये वही लाल बहादुर शास्त्री से जिन्होंने खुद के लिए गाड़ी सरकारों पैसों से न लेकर बैंक से लोन लेकर गाड़ी लिया था, लेकिन कामी, वामी व अत्याचारी कांग्रेसी उनके शौर्य को इतिहास में दफन कर दिया और दफन इस लिए कर दिया कि कहीं नेहरू से ज्यादा शास्त्री जी की लोकप्रियता न बढ़ जाये इसलिए हमें कभी नहीं बताया गया कि 2 अक्टूबर को भारत के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का भी जन्म दिवस होता है

आइये आज उसी महान आत्मा के जीवन से जुड़ी एक कहानी से रूबरू करवाते है भारत के दूसरे प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्रीजी सरलता और महानता को प्रतिकृति थे। उनके जीवन के अनेक प्रसंग प्रेरणाप्रद है। जब वे देश के प्रधानमंत्री थे तब की बात है। एक दिन वे कपड़ों को मिल देखने के लिए गए। उनके साथ मिल के स्वामी, उच्च अधिकारी तथा अन्य प्रशासकीय लोग थे।

मिल देखने के उपरांत वे मिल के गोदाम में गए और वहां उन्होंने सुंदर साडियाँ दिखाने के लिए कहा। मिल के स्वामी और अधिकारियों ने उन्हें एक से बढ़कर एक साडिया दिखाई । शास्त्रीजी साडियां देखकर बोले, साडियां तो बहुत सुंदर है, इनका क्या मूल्य यह साडी ८०० रुपयों की है और इसका मूल्य एक सहस्र रुपए है मिल के स्वामी ने कहा इसपर शास्त्रीजी बोले, यह तो बहुत महंगी है। मुझे अल्प मूल्य की साडियां दिखाइए यहांपर यह ध्यान में लेना चाहिए की प्रस्तुत घटना १९६४ को थी। उस समय एक हजार रुपयों का मूल्य अधिक था।

अच्छा, यह देखिए, यह साड़ी पाच सौ रुपयों की है और यह चार सौ रुपयों की है मिल का स्वामी दूसरी साडियां दिखाते हुए बोला। अरे भाई, ये भी बहुत महंगी है । मेरे जैसे निर्धन को अल्प मूल्यों को साडियां दिखाइए, जो में खरीद सकूंगा। शास्त्रीजी ने कहा चाह सरकार | आप तो हमारे प्रधानमंत्री है। आपको निर्धन कैसे कर सकते है? हम तो आपको यह साडियां उपहार में देना चाहते है मिल के स्वामी ने कहा ।

नहीं भाई, में तुम से उपहार नहीं ले सकता । शास्त्रीजी ने कहा । इसपर उस मिल के स्वामी ने अधिकार से कहा, अपने प्रधानमंत्री को उपहार देना, यह हमारा अधिकार है।

हा में प्रधानमंत्री हूं। शास्त्रीजी ने शांततापूर्वक कहा। परंतु इसका अर्थ यह नहीं की जिन वस्तुओं को में खरीद नहीं सकता उनका मे उपहार के रूप में स्वीकार करने और अपने पत्नी को दू। भले ही में प्रधानमंत्री हूँ तब भी हूँ निर्धन ही न आप मुझे सरती साडियां दिखाइए मेरो क्षमता के नुसार ही मैं साड़ी खरीदूंगा

मिल के स्वामी की की हुई सभी विनतिया व्यर्थ गई। देश के प्रधानमंत्री ने सस्ते भाव की साड़ियां ही खरीद ली। शास्त्रीजी इतने महान थे की माह उन्हें स्पर्श भी नहीं कर सकता था।

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