घर में सम्पन्नता लानी है तो ऐसी जगह रखें तिजोरी

laxmi

महालक्ष्मी प्रीत्यर्थम्
अलक्ष्मी निवारणार्थम्
जब समुद्र मंथन हुआ तो लक्ष्मी की बड़ी बहन ज्येष्ठा लक्ष्मी का भी आगमन हुआ। जहां लक्ष्मीजी घर में सम्पन्नता लाती हैं, वहीं ज्येष्ठा लक्ष्मी दरिद्रता की अधिष्ठात्री देवी हैं। भारतीय वाङ्गमय में ज्येष्ठा लक्ष्मी को नाश कहा गया है। श्रीसूक्त में एक सूक्त ज्येष्ठा लक्ष्मी को लेकर इस प्रकार है-


क्षुत्पिासामलां ज्येष्ठामलक्ष्मीं नाशयाम्यहम्।
अभूतिमसमृद्धिं च सर्वां निर्णुद मे गृहात्।।
अर्थात
क्षुधा और पिपासा से मलिन लक्ष्मीजी की बड़ी बहिन जो कि क्षीणकाय रहती हैं, मैं उनका नाश चाहता हूं। हे लक्ष्मी जी! मेरे घर से दरिद्रता और अमंगल का नाश करो।
समुद्र मंथन में लक्ष्मी से पहले अलक्ष्मी का आगमन हुआ। वर्तमान समय में जितने भी गलत संस्कार हैं, पाप कार्य हैं, जहां कलह होती हो, जितने भी बुरे व्यसन हैं वे सब अलक्ष्मी की श्रेणी में आते हैं।

भगवान विष्णु ने ज्येष्ठा लक्ष्मी का विवाह दुसह ऋषि से किया तो उनके आश्रम के वैदिक मंगलाचरण को वे सहन नहीं कर पायी, तब उन्होंने ऋषि से कहा कि मुझे वहां ले चलो जहां ‘वेद ध्वनि, अतिथि सत्कार, यज्ञ, दान, शिवभक्त व स्वच्छ लोग न रहते हों, जहां स्त्रियों का सम्मान हो, ब्राह्मण का सम्मान हो, खान-पान व व्यवहार में संयम हो मुझे वहां मत ले चलो।’मार्कण्डेय ऋषि ने उपदेश दिया कि जो स्त्री तुम्हारी धूप व पुष्प से पूजा करती हो उसके घर में मत जाना।

पद्मा लक्ष्मी

जहां समस्त सदगुण, भक्ति, उपासना, गुरु व देव पूजा व अच्छे संस्कार होते हैं वहां लक्ष्मीजी वास करती हैं। क्रुद्ध होकर लक्ष्मीजी ने दानवीर बलि को भी त्याग दिया था और ऋषि के श्राप के कारण स्वर्ग को भी त्याग दिया था। इसी कारण से उन्हें समुद्र मंथन के माध्यम से पुनः प्रकट होना पड़ा।

तिजोरी : कुबेर या लक्ष्मी का स्थान

वास्तु शास्त्र में तिजोरी की स्थापना अत्यन्त महत्वपूर्ण है। तिजोरी जिसमें धन या रोकड़ रहती है, तिजोरी अलक्ष्मी कारक भी हो सकती है। कुबेर उत्तर दिशा के दिक्पाल हैं और इसीलिए भूखण्ड के उत्तर दिशा में तिजोरी का रखना या व्यावसायिक उपक्रमों में दैनिक रोकड़ का रखना शास्त्र सम्मत माना गया है। कुबेर का खजाने से संबंध है और वे धनाध्यक्ष हैं। कुबेर को भगवान शिव की मित्रता प्राप्त हो गयी थी, वे रावण के सौतेले भाई हैं और विश्रवा मुनि के पुत्र हैं।

दक्षिण दिशा में तिजोरी का औचित्य

मैंने कुछ शिक्षकों को व कुछ संस्थाओं को नैर्ऋत्य कोण में तिजोरी की स्थापना का निर्देश देते हुए देखा है। कुछ तथाकथिक वास्तु शास्त्री शास्त्रों से बिल्कुल भी संकेत नहीं लेते, योग्य गुरुओं से दीक्षित नहीं होते और वे मनमानी सलाह दे देते हैं। नैर्ऋत्य कोण में शास्त्रों में शस्त्रागार स्थिापित करने का निर्देश मिलता है। आधुनिक काल में कुछ वास्तु शास्त्रियों ने शस्त्र न होने की स्थिति में यंत्र रखने की सलाह दी है। अब सरकारों ने हथियार रखने पर पाबंदी लगा दी है, इसलिए यंत्र या मशीनों का विकल्प एक समझौतावादी रूख है।

पुराण कथा
ब्रह्माजी ने कुबेर को उत्तर दिशा का लोकपाल नियुक्त किया। वे उत्तर दिशा के संरक्षक हैं, उन्हें यक्षराज भी माना जाता है। पुराण कथाओं में यक्षों को धनाढ्य माना गया है और वे धनी होने का वरदान देते हैं। उनका अस्त्र गदा है, उनकी सहधर्मिणी भद्रा है तथा उनका वाहन पुष्पक विमान है, लंका व अल्कापुरी उनका वास है। रावण से पहले लंका कुबेर के पास ही थी। पौराणिक कथन है कि उन्हें आवास के लिए लंका प्रदान की गयी थी।

दक्षिण में तिजोरी रखने का पौराणिक साक्ष्य

जयपुर शहर प्रसिद्ध वास्तु शास्त्री विद्याधरजी का बसाया माना गया है। जयपुर शहर के परकोटे के अन्दर के मकानों में दक्षिण दिशा में मास्टर बेडरूम होने के साथ-साथ दक्षिण में चढ़ती हुई सीढ़ियों के नीचे की खाली जगह जिसे बुखारी भी कहते हैं, वहां तिजोरी या संदूक रखने की परम्परा चली आयी है। वास्तु ग्रंथों में यह बात आमतौर से नहीं मिलती है। उत्तर दिशा के दिक्पाल होने के नाते भवनों के उत्तर दिशा में तिजोरी रखने की परम्परा का विकास हुआ। सम्भवतः कुबेर को लंका का निवास मिलने के कारण तिजोरी की व्यवस्था दक्षिण में रखने की परम्परा शुरु हो गयी थी। अन्य किसी भी ग्रंथ में इन दो दिशाओं के अतिरिक्त कहीं भी तिजोरी रखने के निर्देश नहीं है।

ज्येष्ठा लक्ष्मी (दरिद्रा) का कारक

जन्म पत्रिका का अष्टम भाव अनिष्ट कारक माना गया है। इस भाव से अगर धन-साधन होता है तो उससे चंचला लक्ष्मी का घर में आगमन होता है जो कि नाशवान होती है। सम्पन्नता जनित दोष घर में आने लगते हैं, इस कारण से आने वाली पीढ़ियों में चरित्र दोष और व्यसन आने लगते हैं और कुल के विनाश की सम्भावनाएं बनने लगती हैं।

अष्टम भाव का शुभ होना बहुत ही कम प्रतिशत में होता है और अधिकांश मामलों में अष्टम भाव से उत्पन्न धन की निंदा ही की गयी है। यह धन ज्येष्ठा लक्ष्मी की प्रकृति का है। जन्म पत्रिका का अष्टम भाव नैर्ऋत्य कोण में पड़ता है। वास्तु शास्त्र के अन्तर्गत भूखण्ड का नैर्ऋत्य कोण या साउथ वेस्ट राक्षसी स्थान है। इसे राहु का क्षेत्र भी माना जाता है। राहु काल में कुमति, अनीति या दुराचरण की सम्भावनाएं सबसे अधिक होती हैं अतः वहां पर तिजोरी की स्थापना से जो धन संग्रह होगा वह अगली पीढ़ी में चरित्र दोष या व्यसन उत्पन्न कर देगा और वंश पतन या कुल के नाश की सम्भावनाएं उत्पन्न हो जाएंगी।

– पं.सतीश शर्मा, एस्ट्रो साइंस एडिटर
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