उत्तराखंड में भारत-चीन सीमा पर भारतीय सेना की पहुंच सुगम करने व् लॉजिस्टिक्स सप्लाई लाइन सुद्रढ़ करने हेतु चल रहे सड़कों के निर्माण को एक एनजीओ “सिटीजन्स फॉर ग्रीन दून” ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर पर्यावरण का हवाला देते हुए रुकवाने का आग्रह किया है।
इस एनजीओ के वकील कॉलिन गोंजालेस और मोहम्मद आफताब ने कोर्ट में तर्क दिया है कि “भारतीय सेना युद्ध में हवाई मार्ग का उपयोग कर सकती है”,
जबकि यथार्थ यह है कि किसी भी युद्ध मे कोई भी सेना उतनी ही प्रभावी होती है जितनी मजबूत उसकी लॉजिस्टिक्स सप्पलाई लाइन हो जिसके माध्यम से आवश्यकता पड़ने पर तीव्र गति से वह फॉरवर्ड पोस्ट्स पर अधिकाधिक फोर्सेज़, वेपन, एम्युनिशन, मिलिट्री इक्विपमेंट भेज सके, और उसके लिए सर्वाधिक आवश्यक है फॉरवर्ड पोस्ट्स तक ऑल वेदर रोडस की कनेक्टिविटी,
और यहां हमारे ही देश का क्रिस्लामोकौमि कबाल और एनजीओ ब्रिगेड खुलेआम डेमोक्रेसी और ज्यूडिशियल राइट्स का दुरुपयोग कर चीनी बॉर्डर से लगने वाली सीमाओं पर भारतीय सेना को कमज़ोर करने के षड्यंत्र रचने में जुटे हैं,
यदि चीन में किसी एनजीओ ने इसी प्रकार की याचिका भारतीय सीमा के संदर्भ में दी होती तो अभी तक उस एनजीओ के एक एक सदस्य व उसके घरवालों को ट्रीज़न के चार्ज में बुक कर चीनी वामपंथियों ने फायरिंग स्क़वाड के आगे खड़ा कर दिया होता,
किन्तु क्योंकि यहां हम लोग “टू मच डेमोक्रेसी” और सड़े हुए ज्यूडिशियल सिस्टम के शिकार हैं अतः हमारा सुप्रीम कोर्ट इस प्रकार की याचिकाएं ततत्काल फाड़कर डस्टबीन में फेंकने तथा याचिका दायर करने वालों व उनके वकीलों पर रासुका में कार्यवाही के बदले उन याचिकाओं पर सुनवाई भी करने बैठ जाता है।
इस जैसी एनजीओ को चीन से फंडिंग होती है। हम भारतीयों को ऐसे लोगों का पता लगाकर उनको उनकी औकात बतानी होगी। ऐसे लोगों को बताना चाहिए कि दुश्मन देश से पैसे लेकर देश की सुरक्षा को कमजोर करने वाले किसी के लिए भी सही नहीं होते हैं।

