44 साल से आतंक का पर्याय बना अतीक मा़त्र 10 सेंकेंड में हुआ ढेर

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प्रयागराज। दिन शनिवार, रात करीब 10.30 बजे, करीब 20 राउंड ताबड़तोड़ फायरिंग और 40 साल से अधिक समय तक आतंक का पर्याय बना अतीक अहमद और अशरफ 10 सेकेंड में ढेर हो गए। इसके बाद पूरे प्रदेश में राजनीतिक तूफान सा आ गया। इसे संविधान की हत्या तक करार दे दिया गया। आइए जानते हैं अतीक का पूरा सच।

अतीक अहमद और उसके भाई अशरफ का अंत इस तरह होगा ये किसी ने सोचा भी नहीं था। सांसद, चार बार विधायक रहे माफिया अतीक पर 44 साल पहले पहला मुकदमा दर्ज हुआ था। तब से अब तक उसके ऊपर सौ से अधिक मामले दर्ज हुए, लेकिन पहली बार उमेश पाल अपहरण कांड में उसे दोषी ठहराया गया। उमेश पाल हत्याकांड के बाद अतीक अहमद के सबसे बुरे दिनों की शुरुआत हो गई थी। अतीक ने क्राइम के दम पर अपनी पहचान बनाई। फिर उसी पहचान के बलबूते राजनीति में एंट्री ली।

28 साल की उम्र में विधायक बना तो ताकत दोगुनी हो गई। जो भी सामने आया वो मारा गया। हर हाई प्रोफाइल हत्याकांड में नाम अतीक का आया। एक के बाद एक 100 से ज्यादा मुकदमे दर्ज हुए, लेकिन कभी किसी केस में सजा नहीं हुई। 44 साल बाद 28 मार्च 2023 को अतीक को उमेश पाल अपहरण कांड में पहली बार सजा सुनाई गई। अतीक के साथ मारा गया अशरफ भी अपने भाई के हमेशा साथ रहा। हर बड़े मुकदमे में अतीक के साथ अशरफ नामजद था।

जल्द अमीर बनने की चाहत में बना माफिया
साल 1962 प्रयागराज का चकिया गांव। तांगा चलाने वाले फिरोज अहमद के घर एक लड़के का जन्म हुआ। नाम रखा अतीक अहमद। फिरोज घर में अकेले कमाने वाले थे। जैसे.तैसे पैसे का इंतजाम कर अतीक को पढ़ा रहे थे, लेकिन उसका पढ़ाई में एकदम मन नहीं लगता था। नतीजा ये हुआ कि वो 10वीं में फेल हो गया। इसके बाद उसने पढ़ाई पूरी तरह छोड़ दी। अब उसे जल्द से जल्द अमीर बनने का चस्का लग गया। लेकिन पैसा कमाने के लिए उसने मेहनत करना नहीैं, बल्कि एक शॉर्टकट को चुना। लूट और अपहरण करके पैसा वसूलने का शॉर्टकट। वो रंगदारी वसूलने के लिए लोगों की हत्या तक को अंजाम देने लगा। साल 1979 में अतीक पर पहली बार एक हत्या का केस दर्ज हुआ।

एक तरफ अतीक क्राइम की दुनिया में अपने कदम जमा रहा था। वहीं दूसरी तरफ शहर में चांद बाबा नाम के गुंडे का दबदबा बढ़ता जा रहा था। इसका खौफ ऐसा था कि चौक और रानीमंडी में पुलिस तक जाने से डरती थी। पुलिस और नेताओं समेत सभी उसके खौफ से छुटकारा पाना चाहते थे। अतीक ने इसी डर का फायदा उठाकर पुलिस और स्थानीय नेताओं से साठगांठ बना ली।
अतीक को आपराधिक दुनिया में पुलिस और स्थानीय नेताओं का पूरा साथ मिलता। सात साल बीते अब अतीक चांद बाबा से ज्यादा खतरनाक हो चुका था। वो लगातार लूट, अपहरण और हत्या जैसी वारदातों को अंजाम देता। अतीक के गुर्गों का नेटवर्क बढ़ने लगा। जिस पुलिस ने उसे अब तक शह दे रखी थी वही उसे जगह.जगह तलाशने में जुट गई। आखिरकार पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया।

गिरफ्तारी के बाद लोगों को लगा कि अतीक का खेल खत्म हो गया, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। उन दिनों प्रदेश में वीर बहादुर सिंह की सरकार थी और केंद्र में राजीव गांधी की। पुलिस सूत्रों के मुताबिक, अतीक की गिरफ्तारी के बाद उसे छुड़ाने के लिए दिल्ली से एक फोन आया। एक साल बाद अतीक जेल से बाहर आ गया।

अतीक को जेल से बाहर आते ही समझ आ गया कि अब जेल से बचने के लिए राजनीति ही उसके काम आ सकती है। इसलिए उसने राजनीति में कदम रखना तय किया। साल 1989 तक अतीक पर करीब 20 मामले दर्ज हो चुके थे। उसका प्रयागराज के पश्चिमी हिस्से पर दबदबा हो गया। 1989 में उसने पहली बार विधायकी लड़ने का फैसला किया। किसी पार्टी ने टिकट नहीं दिया तो निर्दलीय खड़ा हो गया।

अतीक के सामने कांग्रेस के गोपालदास यादव प्रत्याशी थे। साथ ही अतीक का बढ़ता दबदबा चांद बाबा को भी अखरने लगा इसलिए वो भी अतीक को हारने के लिए चुनाव में खड़ा हो गया। चुनाव हुआ। नतीजे आए तो अतीक को 25,906 वोट मिले। वह 8,102 वोट से जीतकर पहली बार विधायक बन गया। उसके बाद तो उसने पीछे मुड़कर नहीं देखा।

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