इस्लामाबाद। सेना, आईएसआई और राजनितक नेताओं ने कई मर्तबा तालिबान व आतंकियों से अपने दोस्ताने का खुलेआम इजहार और इकरार किया है, लेकिन अब ये रिश्ता पाकिस्तान की सेहत के लिए हानिकारक होता जा रहा है। अल अरबिया पोस्ट के मुताबिक अफगानिस्तान पर तालिबान के कब्जे के बाद पाकिस्तान में आतंकवाद व सांप्रदायिक हिंसा बढ़ गई है। पाक सरकार ने तालिबान को अफगानिस्तान में सत्ता हथियाने के काबिल बनाया।
भले ही आतंक के इस नापाक रिश्ते की खुमारी फिलहाल पाक के सिर से उतरती नहीं दिख रही है, लेकिन इसकी पाकिस्तान हर रोज चुका रहा है। देववंदी व बरेलवी कट्टरपंथियों की सरकार से लड़ाई का सबसे ज्यादा खामियाजा अल्पसंख्यकों को भुगतना पड़ रहा है। दोनों ही कट्टरपंथी धड़े अल्पसंख्यकों को निशाना बना रहे हैं। पाकिस्तान ब्यूरो आफ स्टैटिस्टिक्स के आंकड़ों के मुताबिक बीते कुछ वर्षों में लक्षित हत्याओं, अपहरण, सांप्रदायिक हमले, भीड़ हिंसा, बम विस्फोट, जबरन धर्मांतरण जैसी घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं। बीते दस वर्ष में पाक के ईसाइयों के खिलाफ 304 घटनाएं हुई हैं, हिंदुओं के खिलाफ 205 घटनाएं सामने आई हैं।
पाकिस्तान में शरिया लाने की लड़ाई… अल अरबिया पोस्ट के मुताबिक अफगानिस्तान में तालिबान अपने सहयोगी तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) की नकेल कसने को तैयार नहीं है। कट्टरपंथी देवबंदी विचारधारा वाली टीटीपी पाकिस्तान में भी शरिया शासन लाना चाहता है। वहीं, कट्टरपंथ की बरेलवी विचारधारा वाला तहरीक-ए लब्बैक पाकिस्तान (टीएलपी) पाकिस्तान में शरिया शासन लाने में टीटीपी का प्रतिद्वंद्वी सह सहयोगी है।

