उत्सवधर्मिता हमारा मौलिक स्वभाव है। उत्सव हमारे जीवंत होने का पता देते हैं। जिस घर और समाज में उत्सव नहीं; वहां अनेक समस्याएं स्वतः ही जन्म ले लेती हैं। उत्सव हमारी सामाजिकता के हमारी सहभागिता के भी प्रतीक हैं। चेतना के जगत में आनंद हमारा धर्म है और उत्सव हमारा जीवन। आज दुनिया में लगभग छह अरब लोग हैं। जिसका एक बटा पांच भाग यानि सवा अरब हम भारतीय हैं।हम तादाद में तो एक बटा पांच हैं जबकि भौगोलिक क्षेत्रफल के हिसाब से हमें पूरी दुनिया का सिर्फ दो प्रतिशत ही मिला है। संसाधनों की कमी और भू-भाग की इतनी संक्षिप्तता होते हुए भी हम भारतीय आज भी समूचे विश्व में सर्वाधिक संतोषी और सुखी हैं , जानते हैं क्यों ? इसके पीछे हमारे सामाजिक सरोकारों में गहरे छिपे जीवन मूल्य हैं , गहरी मान्यताएं हैं; जो उत्सवधर्मिता की नींव पर टिकी हैं।
हम सबसे ज़्यादा फेस्टिव कौम हैं । हमारे यहाँ जितने तीज- त्यौहार हैं, उतने दुनिया के न तो किसी देश में हैं और न ही किसी धर्म में ! त्यौहारों की परंपरा विकसित करने के पीछे हमारे ऋषि मुनियों की गहरी और गंभीर सामाजिक अवधारणाएं थीं। भारतीय मनीषियों को हज़ारों वर्ष पूर्व ही इस तथ्य का भली-भांति भान हो गया था , कि मनुष्य सिर्फ संपदा से संतुष्ट होने वाला जीव नहीं है। न ही स्वार्थ की भावना ही हमें सुखी जीवन दे सकती है। फिर मानव की अंततः अभीप्सा आखिर है क्या ?
मनुष्य तब तक संतुष्ट नहीं हो सकता जब तक वह ईश्वरीय गुणों को अपने जीवन में अंगीकार नहीं कर लेता! अब आप कहेंगे आपने तो और भी उलझा दिया !, भला ये ईश्वरीय गुण क्या बला हैं ? ईश्वरीय गुणों के समाविष्ट होने का अभिप्रायः है आपके जीवन का परम संतोषी होना। एक ऐसी स्थिति जहाँ आप सिर्फ मैं और मेरे के भाव से तर जाते हैं। सोना जगना , खाना पीना , मैथुन और संघर्ष तो पशु-पक्षियों में भी है फिर आप किस तरह उन सब से पृथक हैं।
सामाजिक प्राणी होने के कारण मानव को इससे भी इतर कुछ चाहिए जहाँ उसे अपनी परिपूर्णता का एहसास हो। उसे एक आत्मिक अनुभूति हो कि उसका जीवन सार्थक मार्ग पर अग्रसर है। इन्हीं उद्देश्यों की प्रतिपूर्ति के लिए उत्सवों ने जन्म लिया। उत्सव हमें देना सिखाते हैं।उत्सव हमें सहयोग सिखाते हैं।उत्सव हमें सामंजस्य सिखाते हैं। उत्सव सिखाते हैं कि यदि प्रभु के प्रताप से तुम प्रसन्न हो उठे हो; तो इसे औरों तक भी बांटों।औरों के साथ जीवन की पुलक को जीना उत्सवों का ध्येय है।
उत्सव सामाजिक बराबरी के लिए सोचा गया एक प्राथमिक उपाय है। उत्सव भीतर घुट रहे भावों के प्रक्षेपण का पर्व है। उत्सव अभावों और प्रभावों से परे अपने निज स्वभावों को पा लेने का अवसर है। उत्सव की छाया में प्रेम के पुष्प पल्लवित होते हैं। उत्सव महावीर का अपरिग्रह है , बुद्ध की करुणा है , कृष्ण का कलरव है और राम की देशना है। उत्सव शिव का श्रृंगार है , दुर्गा की आराधना है, हिमालय का नाद है और ओउम् का हुंकार है । उत्सव बच्चों की किलकारी है, उत्सव प्रफुल्लित नारी है ।उ त्सव मित्रता है । उत्सव मौसम है, उत्सव बरखा है, उत्सव फूलों की क्यारी है। जहाँ प्रेम है, वहां का पहला लक्षण उत्सव है।
एक औरत ने तीन संतों को अपने घर के सामने देखा। वह उन्हें जानती नहीं थी।
औरत ने कहा – “कृपया भीतर आइये और भोजन करिए।”
संत बोले – “क्या तुम्हारे पति घर पर हैं?”
औरत – “नहीं, वे अभी बाहर गए हैं।”
संत –“हम तभी भीतर आयेंगे जब वह घर पर हों।”
शाम को उस औरत का पति घर आया और औरत ने उसे यह सब बताया।
पति – “जाओ और उनसे कहो कि मैं घर आ गया हूँ और उनको आदर सहित बुलाओ।” औरत बाहर गई और उनको भीतर आने के लिए कहा। संत बोले – “हम सब किसी भी घर में एक साथ नहीं जाते।” “पर क्यों?” – औरत ने पूछा।
उनमें से एक संत ने कहा – “मेरा नाम धन है” फ़िर दूसरे संतों की ओर इशारा कर के कहा –“इन दोनों के नाम सफलता और प्रेम हैं। हममें से कोई एक ही भीतर आ सकता है। आप घर के अन्य सदस्यों से मिलकर तय कर लें कि भीतर किसे निमंत्रित करना है।”
औरत ने भीतर जाकर अपने पति को यह सब बताया। उसका पति बहुत प्रसन्न हो गया और बोला –“यदि ऐसा है तो हमें धन को आमंत्रित करना चाहिए। हमारा घर खुशियों से भर जाएगा।” पत्नी – “मुझे लगता है कि हमें सफलता को आमंत्रित करना चाहिए।”
उनकी बेटी दूसरे कमरे से यह सब सुन रही थी। वह उनके पास आई और बोली –
“मुझे लगता है कि हमें प्रेम को आमंत्रित करना चाहिए। प्रेम से बढ़कर कुछ भी नहीं हैं।”
“तुम ठीक कहती हो, हमें प्रेम को ही बुलाना चाहिए” – उसके माता-पिता ने कहा।
औरत घर के बाहर गई और उसने संतों से पूछा – “आप में से जिनका नाम प्रेम है ,वे कृपया घर में प्रवेश कर भोजन गृहण करें।” प्रेम घर की ओर बढ़ चले। बाकी के दो संत भी उनके पीछे चलने लगे। औरत ने आश्चर्य से उन दोनों से पूछा – “मैंने तो सिर्फ़ प्रेम को आमंत्रित किया था।
आप लोग भीतर क्यों जा रहे हैं?” उनमें से एक ने कहा – “यदि आपने धन और सफलता में से किसी एक को आमंत्रित किया होता तो केवल वही भीतर जाता। आपने प्रेम को आमंत्रित किया है। प्रेम कभी अकेला नहीं जाता। प्रेम जहाँ-जहाँ जाता है, धन और सफलता उसके पीछे जाते हैं और जहाँ प्रेम धन और सफलता है वहां उत्सव होने में कोई भी रुकावट नहीं है। जिन घरों में सिर्फ धन सफलता और प्रेम हैं वहां भी एक सूनापन एक खालीपन आपको अखरेगा इसकी प्रतिपूर्ति सिर्फ और सिर्फ उत्सव से पूरी हो सकती है।
परमात्मा स्वयं उत्सवधर्मा है। जब अपने इस गुण के साथ वह अवतरित होता है, तभी आप उसे पूर्ण कला सम्पन्न अवतार मानते हैं। श्री राम से एक कदम आगे बढ़कर जब श्री कृष्ण की बाँसुरी से नेह के सुर फूटते हैं, तो ऐसा उत्सव पैदा होता है, जो पांच हज़ार साल बीत जाने के बाद भी जीवंत है। प्रकृति का रोम रोम उत्सव पूर्ण है। कली का फूल बन जाना एक उत्सव है जो हेतु बनेगा और भी अन्य जीवन के जन्म का। फिर वहां भँवरें अपनी पींगें बढ़ाएंगे और तितलियाँ करेंगी कलरव प्रणय के नूतन संधान का। नदियों का बहना है एक उत्सव प्रकृति के निनाद का, मिलन का शंखनाद सागर से प्रलाप का।झूलती लताएं और क्षितिज को चूमते वृक्ष सभी तो उत्सवमय हैं सिर्फ बुद्धि पाकर मानव ही उदास बैठा है।
चेतना को यदि चूमना है अपने शिखर को तो उसे भी होना होगा -उल्लासपूर्ण ,उत्सवपूर्ण ! उत्सव का वास्तविक उद्देश्य सिर्फ खुद का मौज मज़ा भर नहीं है , यह सह जीवन का विस्तार है। इसी विस्तार को चरितार्थ करने के लिए परस्पर उपहारों और मिष्ठानों को बाँटने की परंपरा प्रारम्भ हुई। जब आप उत्सवों के मौकों पर एक दूसरों से मिलते हैं तो जीवन की जटिलताएं सुलझती हैं।
शिकायतें घटती हैं ।सहयोग और सामंजस्य बढ़ता है। हम एक दूसरे की खूबियों और खामियों से परिचित होते हैं।घरों की जरूरतें और परिवार के सभी सदस्यों से प्रेम परिचय प्रगाढ़ होता है। विशेषताएं हस्तांतरित होती हैं और गुण एवं अनुभवों का आदान प्रदान होता है। सभी सुन्दर और सहज वस्त्रों का वरण करें और सब मिल बैठकर सभी आपदाओं का हरण करें यहीं उत्सवों की प्राणऊर्जा है , इसे ही बचाये रखने है। आभासी माध्यमों ट्वीटर, फेसबुक और व्हाटसप के युग में मिल बैठकर , बतिया कर थोड़ा गपियाकर उत्सव मनेंगे तो क्या कहने ।


