राजकुमार दक्ष
सोमनाथ। प्रभास पाटण की यह पवित्र धरती अनेक ऐतिहासिक धरहरों और सभ्यताओं को संजोए बैठी है। यह भूमि कितनी पवित्र, समृद्ध एवं स्वर्णिम अतीत की स्वामी है कि इसके वैभव की यहाँ के ताम्रपत्र, अभिलेख तथा शिलालेख साक्षी देते हैं। आज भी शौर्य गाथा की गर्वपूर्ण रण गर्जना करने वाले नंदी इस भूमि के पराक्रम की गवाही देते हैं।
प्रभास पाटण तथा सोमनाथ देवालय के इतिहास को उजागर करने वाले आभिलेखिक प्रमाण, प्रमाणभूत अवशेष प्रभास क्षेत्र में विभिन्न स्थानों पर स्थित हैं। सोमनाथ तथा प्रभास क्षेत्र के देदिप्यमान अमर इतिहास के प्रमाण देने वाले शिलालेख और ताम्रपत्र प्रभास पाटण म्यूजियम में संरक्षित हैं। अनेक आक्रमणों से ध्वस्त मंदिर के अवशेष शौर्य, शक्ति एवं समर्पण के जीवंत प्रमाण के रूप में आज भी म्यूजियम में जतन करके रखे हुए हैं। हाल में यह म्यूजियम प्रभास पाटण में पौराणिक सूर्य मंदिर में कार्यरत है।
इस म्यूजियम के अधीनस्थ ऐसा ही एक शिलालेख प्रभास पाटण में म्यूजियम के निकट पुराने राम मंदिर के बगल में भद्रकाली फळिया (मोहल्ले) में स्थित है। सोमपुरा ब्राह्मण दीपकभाई दवे के निवास स्थान पर यह ऐतिहासिक धरोहर संरक्षित है। उनके प्रांगण में स्थित पौराणिक भद्रकाली मंदिर की दीवार पर यह शिलालेख आज भी जड़ित है।

प्रभास पाटण म्यूजियम क्यूरेटर (संग्रहलायध्यक्ष) श्री तेजल परमार ने विवरण देते हुए बताया कि ई. स. 1169 (वलभी संवत 850 तथा विक्रम संवत 1255) में उत्कीर्णित तथा हाल में राज्य पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित यह शिलालेख अणहिलवाड पाटण के महाराजाधिराज कुमारपाल के धर्मगुरु परम पाशुपाताचार्य श्रीमद् भावबृहस्पति का प्रशस्ति लेख है। इस अभिलेख में सोमनाथ मंदिर का पौराणिक एवं मध्य कालीन इतिहास लिपिबद्ध है। इस अभिलेख में चारों युगों में सोमनाथ महादेव के निर्माण का उल्लेख है, जिसके अनुसार सतयुग में (चंद्र) सोम ने सोने का, त्रेता युग में रावण ने चांदी का, द्वापर युग में श्री कृष्ण ने काष्ट का और कलियुग में राजा भीमदेव सोलंकी ने सुंदर पाषाण का कलात्मक देवालय बनवाया था।
इतिहास के पन्नों पर दृष्टि डालें, तो मंदिर के पुराने अवशेषों पर भीमदेव सोलंकी द्वारा चौथे मंदिर का निर्माण किए जाने का तथ्य प्रमाणभूत है। इसके बाद ई. स. 1169 में कुमारपाल का पाँचवाँ मंदिर भी उसी स्थान पर बना था। सोलंकी शासकों के काल में प्रभास पाटण केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि स्थापत्य एवं साहित्य का भी केन्द्र था। सिद्धराज जयसिंह की न्यायप्रियता तथा कुमारपाल की धर्मनिष्ठा ने सोमनाथ के शिखर को गौरव के उच्चतम सोपना पर स्थापित किया, जो आज भी गुजरात के स्वर्णिम काल की गरिमापूर्ण प्रतीति कराता है।
प्रभास पाटण की इस पवित्र मृदिंका (धरती) उसके उदर में केवल अवशेषों को ही नहीं, अपितु सनातन धर्म के आत्मगौरव को भी संग्रह किए बैठी है। भद्रकाली फळिया के इस ऐतिहासिक शिलालेख में उत्कीर्णित अक्षरमाला आज भी सोलंकी शासकों के समर्पण एवं भावबृहस्पति जैसे ज्ञानियों के पुरुषार्थ की प्रतीति कराती है। शिल्प, स्थापत्य तथा साहित्य के त्रिवेणी संगम समान यह भूमि उसकी ऐतिहासिक विरासत द्वारा आने वाली पीढ़ियों को हमारे स्वर्णिम अतीत की झाँकी कराती रहेगी। प्रभास की यह देदिप्यमान विरासत तथा सोमनाथ का अजेय शिखर इस बात की प्रबल साक्षी देते हैं कि समय चाहे जितना बलवान हो, परंतु भक्ति तथा स्वाभिमान के शिखर सदैव अविनाशी रहते हैं।

